विपक्ष का तीखा हमला: आंदोलनों को कुचलने और असहमति को दबाने का आरोप, ‘कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम’ पर उठाए सवाल
राजनीतिक
ब्यूरो, नई दिल्ली
देश के वर्तमान राजनीतिक परिवेश में ‘विरोध के अधिकार’ को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। आरोप है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना सबसे बड़ा “अपराध” बनता जा रहा है। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का दावा है कि केंद्र की सत्ता अब असहमति को ‘देशद्रोह’ और जायज सवालों को ‘साजिश’ करार देकर कुचलने की नीति पर चल रही है।
दमन के चक्र में हर वर्ग: युवाओं से लेकर किसानों तक
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ समय में समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उठाए गए मुद्दों को लोकतांत्रिक संवाद के बजाय ‘लाठी और मुकदमे’ से शांत करने की कोशिश की गई है:
युवा और भविष्य: पेपर लीक से परेशान युवाओं ने जब सड़कों पर न्याय मांगा, तो उन्हें भविष्य के आश्वासन के बजाय पुलिस की लाठियां मिलीं।
बेटियों की पुकार: देश का गौरव बढ़ाने वाली महिला पहलवानों ने जब एक प्रभावशाली भाजपा नेता के खिलाफ जांच की मांग की, तो उनके आंदोलन को बदनाम कर उन्हें जबरन सड़कों से हटाया गया।
किसानों का संघर्ष: अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे किसानों को ‘देशविरोधी’ बताकर उन पर आंसू गैस और रबर की गोलियों का इस्तेमाल संवाद का जरिया बना।
आदिवासी और पर्यावरण: जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले आदिवासियों और जहरीली हवा के खिलाफ खड़े नागरिकों की आवाज को ‘राजनीति’ कहकर दबा दिया गया।
संवैधानिक संस्थाओं और विरोध पर पहरा
ताजा विवाद यूएस ट्रेड डील (US Trade Deal) के विरोध को लेकर है। युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को “देशविरोधी” कृत्य बताकर गिरफ्तारियां की गईं, जिसने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि जब सत्ता खुद को राष्ट्र समझने लगे और आलोचना को दुश्मनी, तब लोकतंत्र का दम घुटने लगता है।
”यह भारत है, नॉर्थ कोरिया नहीं”
सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोलते हुए कहा जा रहा है कि एक ‘कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम’ सवालों से डर रहे हैं। लोकतंत्र की मजबूती सरकार की जवाबदेही में है, न कि विरोधियों को जेल भेजने में। विशेषज्ञों का तर्क है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
