केंद्रीय गृह मंत्री ने हाल ही में लोकसभा में यह दावा किया कि देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है और खासकर बस्तर जैसे इलाकों में हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। उनके अनुसार, जहां पहले हिंसा और असुरक्षा का माहौल था, वहां अब स्कूल, सड़कें और राशन की दुकानें खुल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलवाद की जड़ गरीबी या विकास की कमी नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, और सरकार ने 31 मार्च 2026 तक इसे खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है।
हालांकि, इस दावे पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि सरकार वास्तविक स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है और इस मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए। संसद में भी यह सवाल उठा कि अगर नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो चुका है, तो फिर बस्तर जैसे क्षेत्रों में अभी भी भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती क्यों बनी हुई है।
बीते दो वर्षों में क्या बदला?
पिछले करीब दो वर्षों में नक्सल विरोधी अभियानों में तेजी आई है। सुरक्षा बलों को अधिक स्वतंत्रता, आधुनिक तकनीक और स्थानीय स्तर पर बेहतर खुफिया नेटवर्क मिला। इसका असर यह हुआ कि कई बड़े माओवादी नेता मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। सैकड़ों उग्रवादियों के मारे जाने, हजारों की गिरफ्तारी और बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण को सरकार अपनी बड़ी सफलता के रूप में पेश कर रही है।
बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने अपनी मौजूदगी काफी बढ़ाई है और कई ऐसे इलाकों तक पहुंच बनाई है जहां पहले सरकारी नियंत्रण बहुत कम था। इससे नक्सल संगठन की संरचना और नेतृत्व को बड़ा झटका लगा है।
इतिहास और पृष्ठभूमि
नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। समय के साथ यह आंदोलन कई राज्यों में फैल गया और 2004 में विभिन्न समूहों के एकजुट होने से इसे एक संगठित रूप मिला। छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक इसका सबसे मजबूत गढ़ बना रहा, जहां माओवादियों ने समानांतर ढांचा तक खड़ा कर लिया था।
क्या चुनौतियां अब भी बाकी हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सैन्य सफलता को अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण करने वाले लोगों के पुनर्वास, उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने और स्थानीय समुदायों का भरोसा जीतने जैसी चुनौतियां अभी भी सामने हैं।
इसके अलावा, यह आशंका भी जताई जा रही है कि नक्सल प्रभाव कम होने के बाद इन इलाकों में जमीन और संसाधनों को लेकर बाहरी हस्तक्षेप बढ़ सकता है। कई आदिवासी समुदाय पहले ही बड़े खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लेकर चिंता जता चुके हैं।

