ट्विशा शर्मा मौत मामला, जबलपुर हाई कोर्ट में लंबी बहस, जमानत पर फैसला सुरक्षित

shikha verma
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ट्विशा शर्मा मौत मामले में आरोपी सास गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत याचिका पर बुधवार (27 मई 2026) को जबलपुर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। लंबी बहस के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो जल्द आने की संभावना है।

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने कोर्ट के सामने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। पीड़ित पक्ष ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जांच के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है और कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में गड़बड़ी हुई है।

पीड़ित पक्ष की दलीलें

पीड़ित पक्ष के वकील ने कहा कि जिला अदालत में सीसीटीवी फुटेज पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके थे, जबकि डीवीआर और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री जब्त की गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि आरोपियों के पास सीसीटीवी डेटा तक पहुंच कैसे थी।

उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद पुलिस को तुरंत सूचना नहीं दी गई, जबकि थाने की दूरी मात्र 200 मीटर थी।

वकील ने आगे कहा कि मौत के बाद 52 से 55 मिनट का समय संदिग्ध है और इस दौरान साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि पास के अस्पताल से एंबुलेंस नहीं बुलाया गया, जिससे मामला और संदेहास्पद बनता है।

“क्राइम सीन ट्रेनिंग” का मुद्दा

कोर्ट में यह भी कहा गया कि गिरिबाला सिंह ने क्राइम सीन एविडेंस और क्राइम सीन मैनेजमेंट की ट्रेनिंग ली हुई है। ऐसे में उन्हें साक्ष्यों की प्रकृति और उनके महत्व की पूरी जानकारी थी, जिससे सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका और बढ़ जाती है।

पीड़ित पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी पक्ष के कुछ लोगों के क्रिमिनल लॉ प्रैक्टिस करने वाले व्यक्तियों से संबंध हैं, जिससे जांच प्रभावित होने की संभावना है।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपी पक्ष की ओर से कहा गया कि घटना के बाद महज 20 मिनट में पीड़िता को AIIMS ले जाया गया था। साथ ही यह भी कहा गया कि पोस्टमार्टम के दौरान गिरिबाला सिंह मौजूद नहीं थीं।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि जांच में सहयोग न करने का आरोप गलत है, क्योंकि दोनों आरोपी उस समय उपलब्ध थे।

सॉलिसिटर जनरल की दलील

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि जिस आधार पर निचली अदालत ने जमानत दी है, उस तरह के मामलों में बड़े पैमाने पर जमानतें दी जा सकती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि FIR दर्ज होने से पहले जमानत देना उचित नहीं था और केस डायरी का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया।

अदालत में बहस का निष्कर्ष

लंबी बहस के बाद कोर्ट ने सभी तर्कों को सुनते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो मामले की दिशा तय करेगा।

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