संसद के विशेष सत्र में केंद्र सरकार ने डीलिमिटेशन (परिसीमन) से जुड़ा बिल पेश किया, जिसमें महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को परिसीमन से जोड़ा गया है। इसके बाद से राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है और पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी बयानबाज़ी देखने को मिल रही है।
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कदम आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पुराने आंकड़ों के आधार पर जल्दबाज़ी में निर्णय लेना चाहती है, जो लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस प्रक्रिया की तुलना नोटबंदी से करते हुए कहा कि इतने बड़े फैसले पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। उनका कहना है कि महिला आरक्षण का समर्थन सभी दल करते हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना अनावश्यक जटिलता पैदा कर रहा है।
सरकार की ओर से नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया कि इस प्रक्रिया में किसी राज्य या क्षेत्र के साथ अन्याय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि परिसीमन पहले से तय अनुपात के अनुसार ही किया जाएगा और महिलाओं को 33% आरक्षण देना सरकार की प्राथमिकता है।
गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि प्रस्ताव के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का विचार है और लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
हालांकि, दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस बिल का विरोध हो रहा है। एम के स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके का कहना है कि परिसीमन के बाद दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है, क्योंकि आबादी के आधार पर उत्तर भारत में सीटें अधिक बढ़ने की संभावना है।
विपक्ष का मुख्य तर्क है कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जा सकता है, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है। वहीं सरकार इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है।

