तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव संकेत किया है, जहाँ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ। 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की आवश्यकता होती है, जबकि टीवीके को 108 सीटें मिली हैं, यानी वह बहुमत से सिर्फ 10 सीट पीछे है। ऐसे में सरकार गठन को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं और विभिन्न दलों के संभावित समर्थन पर चर्चा शुरू हो गई है। संवैधानिक रूप से स्थिति स्पष्ट है कि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 10 मई तक समाप्त हो रहा है, इसलिए उससे पहले नई सरकार का गठन आवश्यक है। यदि टीवीके पर्याप्त विधायकों का समर्थन जुटा लेती है, तो वह सीधे सरकार बना सकती है, अन्यथा विजय मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर 15 दिनों के भीतर विधानसभा में बहुमत साबित कर सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, टीवीके के पास बहुमत तक पहुँचने के लिए कई छोटे और मध्यम दलों का संभावित समर्थन उपलब्ध है। इनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगभग पाँच विधायक, विदुथलाई चिरुथिगल काची के दो विधायक, वामपंथी दलों के चार विधायक और डीएमडीके का एक विधायक शामिल हैं। यदि ये सभी दल टीवीके का समर्थन करते हैं, तो विजय आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर सकते हैं। इसके अलावा पट्टाली मक्कल काची और अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम जैसी पार्टियों के समर्थन की भी संभावनाएँ जताई जा रही हैं, जो राजनीतिक समीकरण को और मजबूत कर सकती हैं।
हालाँकि, बड़ी पार्टियों जैसे द्रविड़ मुनेत्र कषगम, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और भारतीय जनता पार्टी की ओर से समर्थन की स्थिति जटिल मानी जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि विजय के लिए इन दलों का समर्थन स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है, क्योंकि उनकी पार्टी खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग और एक नए विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही है। इसके अलावा, विजय पहले ही गठबंधन सरकार की बात कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक रुख को लेकर कुछ सीमाएँ भी तय की हैं, खासकर बीजेपी के संदर्भ में।
इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संभावित गठबंधन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति, खासकर लोकसभा चुनावों के लिए भी एक आधार बन सकता है। यदि विजय सफलतापूर्वक विभिन्न दलों को साथ लाकर स्थिर सरकार बना लेते हैं, तो यह तमिलनाडु की पारंपरिक दो-दलीय राजनीति—डीएमके और एआईएडीएमके—के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा। कुल मिलाकर, तमिलनाडु में इस बार का जनादेश बदलाव और नए राजनीतिक प्रयोग की ओर इशारा करता है, जहाँ अब सबकी नजर इस बात पर है कि विजय किस तरह समर्थन जुटाकर अपनी सरकार को स्थिर और प्रभावी बना पाते हैं।

