‘जिन्न’ के नाम पर यौन शोषण मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी मौलवी की जमानत ठुकराई

shikha verma
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के गंभीर मामले में आरोपी मौलवी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। आरोपी पर आरोप है कि उसने “जिन्न” निकालने और रूहानी इलाज के नाम पर बच्ची का यौन शोषण किया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर है और आरोपी ने परिवार के विश्वास तथा पीड़िता की कमजोर स्थिति का दुरुपयोग किया है।

यह मामला प्रेम नगर थाना क्षेत्र का है, जहां आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपी मौलवी अक्टूबर 2019 से न्यायिक हिरासत में है।


कैसे हुआ पूरा मामला

जानकारी के अनुसार, पीड़िता लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी। परिवार को शक था कि उस पर किसी बुरी आत्मा या “जिन्न” का प्रभाव है। इसी विश्वास के चलते परिवार ने स्थानीय लोगों और रिश्तेदारों की सलाह पर एक मौलवी से संपर्क किया, जो खुद को रूहानी इलाज करने वाला बताता था।

आरोपी मौलवी नियमित रूप से पीड़िता के घर आने लगा। एक दिन उसने परिवार के सदस्यों को कमरे से बाहर भेज दिया और दावा किया कि “जिन्न” निकालने की प्रक्रिया के लिए गोपनीयता जरूरी है। इसके बाद उसने नाबालिग से आपत्तिजनक हरकतें कीं और कथित तौर पर उसका यौन शोषण किया।

आरोपी ने यह भी धमकी दी कि यदि इस बारे में किसी को बताया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। बाद में पीड़िता ने पूरी घटना अपनी मां को बताई, जिसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।


कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं

आरोपी की ओर से दायर जमानत याचिका में कहा गया कि वह 2019 से जेल में है और मुकदमे की सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है। बचाव पक्ष ने गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभासों का हवाला देते हुए जमानत की मांग की।

वहीं, सरकारी पक्ष ने जमानत का कड़ा विरोध किया और कहा कि आरोपी ने परिवार की आस्था और नाबालिग की स्थिति का गलत फायदा उठाया। पीड़िता का बयान FIR और CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में समान पाया गया।


हाईकोर्ट का फैसला

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि आरोपी ने विश्वास का दुरुपयोग किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्तर पर गवाहों के बयानों में विरोधाभास जैसे मुद्दों की विस्तृत जांच नहीं की जा सकती, यह ट्रायल का विषय है।

कोर्ट ने यह कहते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। हालांकि, अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई यथासंभव जल्द पूरी की जाए।

यह मामला धार्मिक आस्था और विश्वास का दुरुपयोग कर किए गए गंभीर अपराध की ओर इशारा करता है। हाईकोर्ट के इस फैसले को पीड़िता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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