मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के इछावर क्षेत्र के ग्राम दीवाडिया में एक 100 वर्षीय बुजुर्ग गोविंद सिंह वर्मा के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा एक अलग ही अंदाज में देखने को मिली। आमतौर पर जहां अंतिम संस्कार के समय शोक का माहौल होता है, वहीं इस गांव में यह विदाई जीवन के उत्सव में बदल गई।
गोविंद सिंह वर्मा ने अपने जीवनकाल में परिवार और समाज के बीच सम्मानपूर्ण और संतोषजनक जीवन व्यतीत किया। परिजनों के अनुसार, उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि उनके निधन के बाद माहौल शोकपूर्ण नहीं, बल्कि शांत और सम्मानपूर्ण हो, जिसमें उनके जीवन की खुशियों की झलक भी हो।
उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके पुत्र बाबूलाल वर्मा और बद्री प्रसाद वर्मा ने पारंपरिक शोक की बजाय ढोल-नगाड़ों और संगीत के साथ अंतिम यात्रा निकाली। इस दौरान गांव के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। जहां एक ओर माहौल में ढोल और संगीत की गूंज थी, वहीं दूसरी ओर परिजनों की आंखें नम थीं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह दृश्य सामान्य अंतिम यात्राओं से बिल्कुल अलग था और यह जीवन के प्रति एक सकारात्मक संदेश देता है। लोगों ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन को सम्मान और सद्भावना के साथ जीता है, तो उसकी विदाई भी सम्मान और प्रेरणा का प्रतीक बन जाती है।
परिजनों ने बताया कि गोविंद सिंह वर्मा का जीवन केवल उम्र का आंकड़ा नहीं, बल्कि त्याग, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों की एक मजबूत मिसाल था। उनकी अंतिम यात्रा ने पूरे गांव को भावुक कर दिया, लेकिन साथ ही जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने का संदेश भी दिया।
यह अनोखी अंतिम यात्रा अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग इसे जीवन और मृत्यु के प्रति एक अलग दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं।


