केंद्र सरकार ने संसद में डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल पेश कर दिया है, जिस पर बहस शुरू हो चुकी है। इस बिल के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। साथ ही, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात भी शामिल है।
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इस बिल का विरोध किया है। कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने संसद में इसका विरोध जताया, जिस पर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार विपक्ष को जवाब देगी।
विपक्ष के मुख्य आरोप
विपक्ष का कहना है कि:
- डीलिमिटेशन के जरिए उत्तर भारत के राज्यों में सीटें ज्यादा बढ़ाई जाएंगी, जिससे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कमजोर होगा।
- महिला आरक्षण को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार 2029 के चुनावों को ध्यान में रखकर सीमांकन प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे दक्षिण, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों के साथ अन्याय होगा।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि यह दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ भेदभाव है। उनका मानना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने से उन राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है।
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी इसी तरह की चिंता जताई और कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं हो सकती।
क्या है विवाद की जड़?
डीलिमिटेशन प्रक्रिया नई जनगणना के आधार पर होती है। फिलहाल आखिरी जनगणना 2011 की है। यदि सीटों का बंटवारा जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों (ज्यादातर उत्तर भारत) को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं।
सरकार का पक्ष
सरकार और बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि:
- सभी राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- महिला आरक्षण के जरिए राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी।
बीजेपी नेताओं का कहना है कि महिलाओं को 30 साल से आरक्षण का इंतजार है और अब इसे लागू करने का सही समय है।
आगे क्या?
इस बिल पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सत्र में चर्चा होगी। यदि यह पास होता है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो सकता है।

