नरेंद्र मोदी एक बार फिर इसराइल दौरे पर जा रहे हैं, लेकिन इस बार माहौल और मायने दोनों अलग हैं। 2017 में उनका दौरा ऐतिहासिक था—किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली आधिकारिक इसराइल यात्रा। तब तस्वीरें, प्रतीक और सार्वजनिक गर्मजोशी चर्चा में थीं। आज, आठ साल बाद, इस यात्रा को इसराइली मीडिया “रणनीतिक मोड़” के रूप में देख रहा है, जहाँ फोकस प्रतीकों से आगे बढ़कर ठोस सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर है।
2017 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के साथ मोदी की नज़दीकी और साझा मंचों ने दोनों देशों के रिश्तों को खुलकर नई पहचान दी थी। उस समय कृषि, जल प्रबंधन, नवाचार और स्टार्टअप सहयोग जैसे क्षेत्रों पर समझौते हुए थे। एक संयुक्त इनोवेशन फंड की स्थापना भी हुई, जिसने तकनीकी साझेदारी को संस्थागत रूप दिया। वह दौर रिश्तों की सार्वजनिक स्वीकृति और विश्वास निर्माण का था।
लेकिन मौजूदा दौरा अलग संदर्भ में हो रहा है। क्षेत्रीय और वैश्विक हालात बदले हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान को लेकर अनिश्चितता, और दक्षिण एशिया में सुरक्षा चुनौतियाँ—इन सबके बीच भारत–इसराइल संबंधों का केंद्र अब रक्षा तकनीक की ओर शिफ्ट होता दिख रहा है। इसराइली अख़बारों की रिपोर्टों के अनुसार, इस बार संभावित बातचीत में एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल शील्ड और काउंटर-ड्रोन तकनीक जैसे विषय प्रमुख हो सकते हैं। Rafael Advanced Defense Systems और Israel Aerospace Industries जैसी कंपनियों की उन्नत प्रणालियाँ भारत की दिलचस्पी के केंद्र में बताई जा रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि सीमाई तनाव और बदलते युद्ध स्वरूप—विशेषकर ड्रोन व मिसाइल खतरों—ने भारत को अपनी वायु रक्षा क्षमताएँ मज़बूत करने के लिए प्रेरित किया है।
इस दौरे का एक राजनीतिक पहलू भी है। मोदी इसराइल की संसद केनेस्सेट को संबोधित करेंगे, लेकिन निमंत्रण को लेकर देश के भीतर विवाद उभरा है। सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष Isaac Amit को आमंत्रित न किए जाने पर विपक्षी नेता Yair Lapid ने बहिष्कार की घोषणा की है। इससे स्पष्ट है कि यह यात्रा इसराइल की आंतरिक राजनीतिक खींचतान के बीच हो रही है, जो इसे और संवेदनशील बनाती है।
इसके साथ ही, दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा रक्षा से आगे भी बढ़ सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम तकनीक और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। इसराइल लंबे समय से भारत को एक विश्वसनीय और उभरती शक्ति के रूप में देखता रहा है, जबकि भारत इसराइल को उच्च-प्रौद्योगिकी और सुरक्षा नवाचार के केंद्र के रूप में मानता है।
2017 का दौरा रिश्तों की औपचारिक और भावनात्मक शुरुआत था। 2026 की यह यात्रा उन रिश्तों की परिपक्वता और रणनीतिक गहराई का संकेत देती है। अब सवाल केवल दोस्ती का नहीं, बल्कि साझा हितों और सुरक्षा जरूरतों के आधार पर भविष्य की दिशा तय करने का है। यही वजह है कि इसराइली मीडिया इस दौरे को सामान्य कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में एक अहम पड़ाव के रूप में देख रहा है।
