2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ममता बनर्जी ने SIR (Special Intensive Revision) को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर रणनीतिक गलती की। चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम कटने, लाखों लोगों के “विचाराधीन” रहने और वोटिंग अधिकारों पर संभावित असर को लेकर जोरदार अभियान चलाया। पार्टी को उम्मीद थी कि यह मुद्दा सीधे उसके वोट बैंक को प्रभावित करेगा और जनता में असंतोष पैदा कर उसे चुनावी लाभ मिलेगा। लेकिन नतीजों से साफ संकेत मिला कि यह रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई।
दरअसल, SIR से जुड़े आंकड़े भले ही गंभीर थे—करीब 90 लाख नामों पर असर और 27 लाख लोगों का अंतिम निर्णय से पहले अटक जाना—लेकिन आम मतदाता के लिए यह मुद्दा प्राथमिकता नहीं बन सका। बड़ी संख्या में मतदाता रोज़मर्रा के मुद्दों, जैसे रोजगार, महंगाई, स्थानीय विकास और सरकारी योजनाओं से जुड़े सवालों को ज्यादा अहम मानते रहे। 2021 के चुनावों में ममता बनर्जी ने कई कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व की छवि के सहारे जीत हासिल की थी, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिला था। इसके विपरीत 2026 में ऐसा कोई नया, स्पष्ट और सकारात्मक एजेंडा या “बड़ा आइडिया” सामने नहीं आया, जो मतदाताओं को प्रेरित कर पाता।
राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी के अनुसार, चुनाव केवल किसी एक मुद्दे पर विरोध जताने का मंच नहीं होता, बल्कि यह एक प्रभावी “नैरेटिव” बनाने का खेल है। मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना होता है कि कोई पार्टी उनके भविष्य के लिए क्या ठोस योजना और दृष्टि रखती है। इस मामले में टीएमसी का फोकस रक्षात्मक ज्यादा रहा—वह SIR के मुद्दे पर लड़ती नजर आई, लेकिन जनता के सामने सकारात्मक विकल्प और स्पष्ट विज़न पेश करने में पीछे रह गई। यही कारण है कि चुनावी विमर्श में वह अपनी पकड़ मजबूत नहीं बना सकी।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति में निरंतरता बनाए रखी। पार्टी ने संगठन को मजबूत करने, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और अपने पारंपरिक मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय समीकरणों को साधने पर ध्यान दिया। साथ ही, उसने विपक्ष की कमजोरियों और रणनीतिक चूकों का भी भरपूर फायदा उठाया। चुनावी राजनीति में यह देखा गया है कि जब एक पक्ष रक्षात्मक हो जाता है, तो दूसरा पक्ष अपने एजेंडे को ज्यादा प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता है—और इस चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठे, खासकर SIR प्रक्रिया को लेकर। हालांकि पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव के शांतिपूर्ण संचालन की सराहना की, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का अंतिम सूची से बाहर रहना लोकतांत्रिक दृष्टि से चिंता का विषय है। इसके बावजूद, उन्होंने यह संकेत दिया कि कुल मिलाकर चुनाव प्रक्रिया व्यवस्थित रही और मतदान में व्यापक बाधाएँ देखने को नहीं मिलीं।
निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक यह रही कि उन्होंने एक ही मुद्दे—SIR—पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई, जबकि व्यापक और सकारात्मक चुनावी एजेंडा प्रस्तुत करने में कमी रह गई। इसके विपरीत, बीजेपी ने संगठन, रणनीति और निरंतर विस्तार के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की। यही कारण है कि चुनावी नतीजों में स्पष्ट अंतर देखने को मिला और यह चुनाव विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण सबक बनकर सामने आया।

