2027 यूपी चुनाव: ब्राह्मण वोटों की अहमियत क्यों बढ़ी, जानें पूरा सियासी समीकरण

shikha verma
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त्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी रणनीतियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी (सपा) ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के साथ अब सवर्ण वोटरों को जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।

5 अगस्त को समाजवादी पार्टी ने पूर्व मंत्री और समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। इस आयोजन में प्रदेशभर से बड़ी संख्या में ब्राह्मण समुदाय के लोगों को शामिल किया गया। राजनीतिक जानकार इसे सपा की ब्राह्मण वोटरों तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं।

ब्राह्मण वोट बैंक पर सभी दलों की नजर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय को लंबे समय से प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता रहा है। आबादी के लिहाज से यह वर्ग भले ही सीमित है, लेकिन कई विधानसभा सीटों पर इसका असर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।

बीजेपी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) समेत सभी प्रमुख दल ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। साल 2007 में बसपा ने ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल की थी, जबकि 2014 के बाद इस वर्ग का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जुड़ा।

सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की रणनीति पीडीए के साथ सवर्ण मतदाताओं को जोड़ने की है। पार्टी का मानना है कि व्यापक सामाजिक गठजोड़ के बिना उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल करना मुश्किल होगा।

हाल के वर्षों में ब्राह्मण मतदाताओं के बीच बीजेपी को मजबूत समर्थन मिला है। हालांकि, सपा अब इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है और जनेश्वर मिश्र जयंती कार्यक्रम को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

चुनावी समीकरण में ब्राह्मणों की भूमिका

राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की आबादी करीब 10 प्रतिशत मानी जाती है। यह समुदाय खासतौर पर मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में प्रभाव रखता है।

2022 विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायकों ने बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की थी। वहीं सपा और कांग्रेस से भी कुछ ब्राह्मण विधायक चुने गए थे।

आगामी चुनाव को देखते हुए सपा अब इस वर्ग के साथ संवाद बढ़ाने और अपने सामाजिक समीकरण को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। वहीं अन्य राजनीतिक दल भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

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