ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत के मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयान ने भारत में राजनीतिक और कूटनीतिक बहस को तेज कर दिया है।
इस घटना के बाद भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बातचीत कर भारत की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया। जयशंकर ने कहा कि व्यावसायिक जहाज़ों को निशाना बनाने वाली ऐसी घातक कार्रवाई उचित नहीं है।
हालांकि, अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी बयान में रुबियो ने कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्षेत्र में सभी वाणिज्यिक जहाज़ों को अमेरिकी सैन्य निर्देशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
9 जून को अमेरिकी नौसेना द्वारा ओमान तट के पास एक व्यावसायिक जहाज़ पर की गई कार्रवाई में 24 भारतीय चालक दल के सदस्य सवार थे। इनमें से 21 को बचा लिया गया, जबकि तीन भारतीय नाविकों की मृत्यु हो गई। इससे पहले भी क्षेत्र में भारतीय क्रू वाले अन्य जहाज़ों पर हमले की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अमेरिकी बयान की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें मृत भारतीयों के प्रति संवेदना व्यक्त नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या जहाज़ को रोकने के लिए ऐसे तरीके नहीं अपनाए जा सकते थे जिनसे जान-माल का नुकसान न होता।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी अमेरिकी रुख की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को इस घटना के लिए स्पष्ट रूप से खेद व्यक्त करना चाहिए था। वहीं कई पूर्व राजनयिकों और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने भी अमेरिकी बयान को कठोर और असंवेदनशील बताया।
पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-प्रदर्शन और दबाव की भाषा बढ़ती दिखाई दे रही है, जबकि मानवीय क्षति पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई।
कुछ विदेशी और भारतीय विश्लेषकों ने रुबियो की टिप्पणी को भारत के लिए एक प्रकार की चेतावनी के रूप में देखा है, जबकि अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की क्षेत्रीय सुरक्षा नीति का हिस्सा है। इस घटना ने भारत-अमेरिका संबंधों और समुद्री सुरक्षा से जुड़े सवालों पर नई बहस छेड़ दी है।


