अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान की भूमिका वैश्विक कूटनीति में लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है, लेकिन हाल ही में उनकी एक नई मांग ने इस्लामाबाद के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है।
ट्रंप ने प्रस्ताव दिया है कि मध्य-पूर्व में शांति और ईरान से जुड़े कूटनीतिक समझौते को व्यापक रूप देने के लिए सभी प्रमुख मुस्लिम देशों को अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना चाहिए। इसमें सऊदी अरब, क़तर और पाकिस्तान जैसे देशों का नाम भी शामिल है।
इस प्रस्ताव के बाद पाकिस्तान की राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिति पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि इसराइल को मान्यता देना पाकिस्तान की दशकों पुरानी विदेश नीति के खिलाफ माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम पाकिस्तान के लिए “रेड लाइन” साबित हो सकता है और इसे स्वीकार करना उसके लिए बेहद कठिन होगा।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाकर अपनी रणनीतिक अहमियत बढ़ाई है, लेकिन इसी वजह से उस पर दबाव भी बढ़ गया है।
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप की कूटनीति में सहयोग जितना बढ़ता है, उतना ही जोखिम भी बढ़ जाता है, क्योंकि इससे ऐसे फैसलों का दबाव बन सकता है जिन्हें लेना किसी देश के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल होता है।
पाकिस्तान लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन में रहा है और उसने इसराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं। इसी कारण अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने का विचार वहां की आंतरिक राजनीति में बड़ा विवाद पैदा कर सकता है।
हालांकि कुछ विश्लेषक मानते हैं कि अगर भविष्य में क्षेत्रीय हालात बदलते हैं और अन्य मुस्लिम देश इसराइल से संबंध सामान्य करते हैं, तो पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल, यह मुद्दा पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बनकर उभरा है।


