लड़की की चुप्पी को सहमति मानना गलत ,तालिबान कानून पर UN की कड़ी आपत्ति

shikha verma
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संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार समिति (CRC) ने अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा जारी एक नए कानून पर कड़ी आपत्ति जताई है। इस कानून में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के विवाह को वैध ठहराने और विवाह के लिए लड़की की “चुप्पी” को सहमति मानने जैसे प्रावधान शामिल हैं। समिति ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है।

समिति ने स्पष्ट किया कि 18 वर्ष से कम आयु में किया गया विवाह बाल विवाह माना जाता है, जो एक हानिकारक प्रथा है और जबरन विवाह की श्रेणी में आता है। उनके अनुसार, बच्चों में विवाह के लिए स्वतंत्र और पूर्ण सहमति देने की क्षमता नहीं होती, इसलिए ऐसे विवाहों को वैध नहीं माना जा सकता।

14 मई को जारी किए गए इस फरमान में कहा गया था कि प्यूबर्टी (यौवन) के बाद लड़कियों के विवाह को वैध माना जा सकता है और लड़की की चुप्पी को सहमति के रूप में स्वीकार किया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र समिति ने इसे खारिज करते हुए कहा कि प्यूबर्टी को वयस्कता या विवाह की कानूनी क्षमता का आधार नहीं बनाया जा सकता।

18 स्वतंत्र विशेषज्ञों वाली इस समिति ने कहा कि बाल विवाह न केवल एक हानिकारक प्रथा है, बल्कि यह बच्चों के मूल मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। इससे लड़कियों को हिंसा, शोषण, कम उम्र में गर्भधारण, शिक्षा में बाधा और गंभीर मानसिक व शारीरिक नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों ने यह भी चिंता जताई कि यह कदम तालिबान की उन नीतियों का हिस्सा है, जिनमें लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध जैसे कई भेदभावपूर्ण नियम शामिल हैं। इन नीतियों के कारण लाखों अफगान लड़कियां शिक्षा और अवसरों से वंचित हो रही हैं, जिससे देश में असमानता और गरीबी बढ़ रही है।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने तालिबान प्रशासन से ऐसे सभी कानूनों को तुरंत वापस लेने की मांग की है और लड़कियों के शिक्षा, सुरक्षा, समानता और समाज में भागीदारी के अधिकारों को बहाल करने की अपील की है, जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप हैं।

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