हाल के दिनों में सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर यह दावा तेजी से चर्चा में है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने देश की आर्थिक स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव को देखते हुए बड़ी मात्रा में सोना बेचा है। कुछ रिपोर्टों और दावों के अनुसार, RBI ने लगभग 83 टन सोना बेचकर करीब 12 बिलियन डॉलर जुटाए हैं। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।
आलोचकों का आरोप है कि यह कदम देश की आर्थिक चुनौतियों का संकेत हो सकता है। उनका कहना है कि यदि विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने के लिए सोने की बिक्री करनी पड़ रही है, तो यह अर्थव्यवस्था की मजबूती पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। विपक्षी दल और सरकार के आलोचक इस मामले में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं तथा यह जानना चाहते हैं कि देश के कुल स्वर्ण भंडार में वास्तव में कितना परिवर्तन हुआ है।
कुछ लोगों ने इस स्थिति की तुलना वर्ष 1991 के आर्थिक संकट से भी की है, जब भारत को विदेशी भुगतान संकट के दौरान सोना गिरवी रखना पड़ा था। उनका तर्क है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सोना राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता रहा है, इसलिए उससे जुड़े किसी भी बड़े निर्णय पर सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
दूसरी ओर, सरकार समर्थकों का कहना है कि केंद्रीय बैंक समय-समय पर अपने रिज़र्व पोर्टफोलियो का प्रबंधन करता है और सोने की खरीद-बिक्री वित्तीय रणनीति का सामान्य हिस्सा हो सकती है। उनका मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक आंकड़ों और RBI के स्पष्टीकरण का इंतजार किया जाना चाहिए।
इस पूरे विवाद ने देश की आर्थिक स्थिति, विदेशी मुद्रा भंडार और स्वर्ण रिज़र्व प्रबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिसके कारण जनता के बीच भी कई सवाल उठ रहे हैं।


