जिस गांव ने दिया अमर शहीद रोशन सिंह, वहीं 70 साल बाद बदली तस्वीर, पक्के पुल ने मिटाई तीन पीढ़ियों की पीड़ा

shikha verma
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देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाले अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा ने स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से कटे रहने का दर्द झेला। खन्नौत नदी पर पक्का पुल न होने के कारण बारिश और बाढ़ के दिनों में गांव का संपर्क कई महीनों तक आसपास के इलाकों से टूट जाता था। इस समस्या का असर एक नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों पर पड़ा। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर बच्चों की पढ़ाई और किसानों की उपज को बाजार तक ले जाने में ग्रामीणों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।

बाद में खन्नौत नदी पर पक्के पुल के निर्माण से ग्रामीणों की यह समस्या काफी हद तक दूर हुई। पुल बनने के बाद नवादा और आसपास के गांवों को सालभर बेहतर आवागमन की सुविधा मिली। शहीद की जन्मभूमि में हुए इस बदलाव को ग्रामीण आज भी वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिली राहत के तौर पर याद करते हैं।

देश के लिए फांसी के फंदे को चूमा

ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही वह साहसी, कुशल पहलवान और निशानेबाजी में दक्ष थे। युवावस्था में उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। बाद में उनका जुड़ाव हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से हुआ और वह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए।

बरेली में अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीनी

वर्ष 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इसी दौरान रोशन सिंह भीड़ के बीच से आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली। उन्होंने हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी।

जेल से बाहर आने के बाद उनका जुड़ाव क्रांतिकारी गतिविधियों से और गहरा हो गया। ब्रिटिश सरकार की नजर में वह प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल हो चुके थे।

काकोरी कांड के बाद मुकदमे में शामिल हुए

दिसंबर 1924 में एचआरए के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से पीलीभीत जिले की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में एक कार्रवाई की गई। इस दौरान हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस मामले में ठाकुर रोशन सिंह के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया, हालांकि उस समय वह गिरफ्तार नहीं हो सके।

इसके बाद 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद ब्रिटिश सरकार ने एचआरए से जुड़े कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया। ठाकुर रोशन सिंह को भी मुकदमे में शामिल किया गया। हालांकि वह काकोरी ट्रेन से सरकारी खजाना लूटे जाने की घटना में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं थे, लेकिन क्रांतिकारी संगठन से उनके जुड़ाव और बमरौली मामले के आधार पर उन्हें भी काकोरी षड्यंत्र मामले में दोषी ठहराया गया।

उनके साथ पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को भी मृत्युदंड दिया गया।

“मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है”

अदालत में सजा सुनाए जाने के दौरान ठाकुर रोशन सिंह ने निर्भीकता का परिचय दिया। उनसे जुड़ा यह कथन आज भी उनके अदम्य साहस की याद दिलाता है—“मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है।”

अंततः उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में उन्होंने गीता का पाठ किया और वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।

आजादी के बाद भी गांव की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं

देश को आजादी मिलने के बाद भी ठाकुर रोशन सिंह का पैतृक गांव नवादा लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझता रहा। खन्नौत नदी पर स्थायी पुल न होने के कारण बरसात के मौसम में गांव का संपर्क प्रभावित हो जाता था। कई बार चार से पांच महीने तक ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी उठानी पड़ती थी।

इसका सीधा असर ग्रामीण जीवन पर पड़ता था। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल होता, विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती और किसानों को अपनी फसल बाजार तक ले जाने में दिक्कत आती। ग्रामीणों के मुताबिक यह समस्या दशकों तक बनी रही और परिवारों की कई पीढ़ियों ने इसे झेला।

पक्के पुल के निर्माण से बदली तस्वीर

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद नवादा के ग्रामीणों ने खन्नौत नदी पर स्थायी पुल की मांग उठाई। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी समस्या रखी और पुल निर्माण की मांग की।

25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में विकास परियोजनाओं से संबंधित कार्यक्रम के दौरान खन्नौत नदी पर पक्के पुल सहित सड़क और डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। इसके बाद पुल का निर्माण कराया गया।

30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नवादा गांव पहुंचे और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर पर जाकर उनकी प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने शहीद के परिवार के बुजुर्गों से भी मुलाकात की। मुख्यमंत्री के गांव पहुंचने के इस अवसर को ग्रामीणों ने शहीद की जन्मभूमि के सम्मान से जोड़कर देखा।

अब इलाके की लाइफलाइन बना खन्नौत पुल

खन्नौत नदी पर पक्का पुल बनने के बाद नवादा दरोवस्त और आसपास के गांवों में आवागमन पहले की तुलना में आसान हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि अब बरसात के दिनों में संपर्क टूटने की समस्या काफी कम हुई है। एंबुलेंस और अन्य जरूरी वाहन गांव तक पहुंच सकते हैं, विद्यार्थी स्कूल-कॉलेज जा सकते हैं और किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में सुविधा मिली है।

गांव में डिग्री कॉलेज और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी हुई है।

ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि की कहानी केवल एक पुल बनने की कहानी नहीं है। यह उस गांव की दशकों लंबी प्रतीक्षा और संघर्ष की कहानी भी है, जिसने देश को एक महान क्रांतिकारी दिया। आज खन्नौत नदी पर बना पुल नवादा और आसपास के ग्रामीणों के लिए महज आवागमन का साधन नहीं, बल्कि विकास से जुड़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन चुका है।

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