नफरती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा—अतिरिक्त कानून की जरूरत नहीं

shikha verma
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नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती भाषण (हेट स्पीच) से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए देश में मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त हैं और फिलहाल किसी अतिरिक्त हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह कहना सही नहीं है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं हैं।

कानून में बदलाव का अधिकार विधायिका के पास
कोर्ट ने कहा कि समय के साथ उभरती सामाजिक चुनौतियों को देखते हुए नए कानून बनाना या मौजूदा कानूनों में संशोधन करना केंद्र सरकार और विधायिका का अधिकार है। अदालत ने विधि आयोग की 2017 की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें इस विषय पर सुझाव दिए गए थे।

भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा
पीठ ने कहा कि नफरती भाषण और अफवाह फैलाने जैसे मुद्दे समाज में भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं, इसलिए इनसे गंभीरता से निपटना जरूरी है।

अदालतें कानून नहीं बना सकतीं
सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि अपराध तय करना और सजा का प्रावधान करना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन नए कानून बनाने या मौजूदा कानूनों को बदलने का निर्देश नहीं दे सकतीं।

मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई संभव
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून—जिनमें पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता और अन्य प्रासंगिक प्रावधान शामिल हैं—नफरत फैलाने, धार्मिक भावनाओं को आहत करने और सार्वजनिक शांति भंग करने जैसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।

इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भी कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संज्ञेय अपराध सामने आने पर प्राथमिकी दर्ज करना पुलिस की अनिवार्य जिम्मेदारी है। फिलहाल, इस मामले में विस्तृत फैसले का इंतजार किया जा रहा है।

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