‘पहले छात्र शिक्षक की पहचान बनाते थे, अब सोशल मीडिया बना रहा स्टार’

shikha verma
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बिहार की राजधानी पटना इन दिनों कोचिंग संस्थानों को लेकर चर्चा में है। कोचिंग संचालकों के बीच चल रहे विवाद के बीच शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग संस्कृति पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ शिक्षक और रीजनिंग विषय के विशेषज्ञ सगीर अहमद ने पटना के बदलते शैक्षणिक माहौल पर अपनी राय रखी।

सगीर अहमद का कहना है कि एक दौर था जब पटना देशभर में कोचिंग शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था। उस समय बिहार ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना आते थे। उन्होंने बताया कि 1987 में पटना आने के बाद उन्होंने रीजनिंग विषय की पढ़ाई को व्यवस्थित रूप से शुरू किया, जब इस विषय के विशेषज्ञ शिक्षक बहुत कम थे।

उन्होंने कहा कि 1990 और 2000 के दशक के बीच रीजनिंग शिक्षा के क्षेत्र में पटना की अलग पहचान थी। बड़ी संख्या में छात्र यहां पढ़ाई के लिए पहुंचते थे और शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव भी अधिक था। उनके अनुसार, उस समय कोचिंग संस्थानों की पहचान छात्रों की सफलता और शिक्षण गुणवत्ता से बनती थी, जबकि आज प्रचार-प्रसार को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

सगीर अहमद ने दावा किया कि पहले छात्रों और शिक्षकों के बीच मजबूत शैक्षणिक संबंध होते थे। छात्रों की सफलता ही किसी शिक्षक की प्रतिष्ठा का आधार बनती थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कोचिंग संस्थानों का प्रचार तेजी से बढ़ा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।

उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2009 के बाद पटना के कोचिंग सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और अन्य कारणों से माहौल बदलने लगा। उनके मुताबिक, इसके बाद धीरे-धीरे शिक्षा के स्तर में गिरावट आई और कोविड-19 महामारी के बाद यह बदलाव और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा।

सगीर अहमद ने छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए विषय आधारित गहन अध्ययन जरूरी है। उनका मानना है कि केवल प्रचार या लोकप्रियता के आधार पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि समय के साथ कई नए शिक्षक और संस्थान सामने आए हैं, लेकिन शिक्षा के मूल उद्देश्य को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, पटना की शैक्षणिक पहचान को फिर से मजबूत करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

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