प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 10 मई की अपील के बाद देश में एक बड़ी बहस छिड़ गई है। पीएम मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, एक साल तक सोना न खरीदने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने और किसानों से रासायनिक खाद का उपयोग घटाने की अपील की थी।
सरकार ने इसे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच “सामूहिक जिम्मेदारी” और “दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा” की दिशा में कदम बताया है। वहीं विपक्ष और कई विशेषज्ञों ने इस अपील की टाइमिंग और असर को लेकर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार ने पहले स्थिति सामान्य बताई और अब जनता से बचत की अपील कर रही है। वहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह सरकार की नाकामी को दर्शाता है कि अब जनता से ही त्याग मांगा जा रहा है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाया कि अगर ईंधन बचत जरूरी थी तो चुनावी प्रचार के दौरान बड़े काफिले और चार्टर उड़ानों का इस्तेमाल क्यों हुआ।
सरकार की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में कहा गया कि देश के पास पर्याप्त तेल और गैस भंडार मौजूद हैं और किसी तरह की तत्काल कमी नहीं है।
बीजेपी नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह अपील सतर्कता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे दूरदर्शी कदम बताया और कहा कि इसका उद्देश्य देश को आत्मनिर्भर बनाना है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह अपील वैश्विक संकट की गंभीरता को दर्शाती है और आगे चलकर तेल की कीमतों और आयात नीति पर असर पड़ सकता है।
दूसरी ओर कारोबारियों और किसान संगठनों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि सोना न खरीदने और खाद के उपयोग में कमी की अपील से व्यापार, रोजगार और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस जारी है। कुछ लोग इसे आर्थिक दबाव मान रहे हैं, तो कुछ इसे पर्यावरण और ऊर्जा संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह अपील केवल एक एहतियाती कदम है या आने वाले आर्थिक दबावों का संकेत।

