उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाकर भारतीय जनता पार्टी पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की है। सियासी जानकार इसे बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति को चुनौती देने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
अखिलेश यादव ने सबसे पहले सोशल मीडिया के जरिए राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाया और मामले में कई सवाल खड़े किए। उन्होंने सरकार और संबंधित संस्थाओं से पारदर्शिता की मांग करते हुए जांच की आवश्यकता पर जोर दिया। बाद में विशेष जांच दल (SIT) के गठन के बाद भी उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि पुजारियों की जांच कराना सनातन परंपराओं का अपमान है।
राम मंदिर और अयोध्या बीजेपी की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को फैजाबाद सीट पर हार का सामना करना पड़ा था, जिससे विपक्ष को हमले का मौका मिला। वहीं 2025 के मिल्कीपुर उपचुनाव में बीजेपी ने जीत दर्ज कर कुछ हद तक अपनी स्थिति मजबूत की थी।
चढ़ावा विवाद के बीच बीजेपी नेताओं ने जांच पूरी होने तक किसी निष्कर्ष पर न पहुंचने की अपील की है। पार्टी का कहना है कि SIT की रिपोर्ट आने के बाद ही तथ्यों की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी भरोसा दिलाया है कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव इस मुद्दे के जरिए अयोध्या में बीजेपी को उसी राजनीतिक मैदान पर चुनौती देना चाहते हैं, जहां भाजपा खुद को सबसे मजबूत मानती है। हालांकि इस रणनीति की सफलता काफी हद तक SIT जांच के निष्कर्षों और जनता की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।
फिलहाल अयोध्या का यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस का विषय बन गया है और आने वाले समय में इसका असर 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतियों पर भी दिखाई दे सकता है।


