बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 30 मार्च को बिहार विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से इस्तीफा देंगे। यह कदम संविधान के नियमों के अनुसार अनिवार्य है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक समय में दोनों सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। 16 मार्च को नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। संविधान और संसदीय नियमों के तहत, राज्यसभा के सदस्य चुने जाने के 14 दिनों के भीतर अपनी पुरानी सीट छोड़ना जरूरी होता है। चूंकि बिहार विधान परिषद में 29 मार्च तक छुट्टियां हैं, इसलिए 30 मार्च को सदन की कार्यवाही शुरू होने के साथ ही वे अपना औपचारिक इस्तीफा सभापति को सौंपेंगे।
नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं और मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने सदन में परिषद के रास्ते ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने 2004 में आखिरी बार लोकसभा का चुनाव नालंदा से लड़ा था। उसके बाद से वे लगातार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के लिए किसी भी एक सदन का सदस्य होना आवश्यक है, और नीतीश कुमार ने इसी व्यवस्था का पालन करते हुए वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया।
विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं। राज्यसभा सदस्य बनकर वे दिल्ली में रहकर केंद्र सरकार में किसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को संभाल सकते हैं। उनके इस कदम को बिहार और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
राज्य में उनके इस्तीफे के बाद विधान परिषद की रिक्त सीट को भरने की प्रक्रिया शुरू होगी, जबकि केंद्र में उनकी नई भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। नीतीश कुमार की यह रणनीति लंबे समय तक राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
