मिसाइल हमलों के बीच ईरान-सऊदी रिश्तों में दरार गहरी

Bole India
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ईरान और सऊदी अरब के बीच 2023 में चीन की मध्यस्थता से हुआ समझौता अब गंभीर संकट में पड़ गया है। हालिया घटनाओं ने दोनों देशों के बीच बनी भरोसे की नींव को लगभग तोड़ दिया है।

पिछले साल अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमलों के बाद सऊदी अरब ने ईरान का समर्थन करते हुए हमलों की निंदा की थी। इसे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना गया था। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

बीते तीन हफ्तों में ईरान ने अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनका असर सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों पर भी पड़ा। ईरान का कहना है कि ये हमले अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए, न कि इस्लामिक देशों के खिलाफ।

इसके बावजूद सऊदी अरब ने कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ने साफ कहा है कि अगर तनाव बढ़ेगा तो जवाब भी उसी तरह दिया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच विश्वास अब टूट चुका है।

इस बदलते रुख के पीछे कई कारण हैं। सऊदी अरब अपनी महत्वाकांक्षी “विजन 2030” योजना को सफल बनाने के लिए क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है। वहीं ईरान की आक्रामक रणनीति से उसकी सुरक्षा और आर्थिक हितों को खतरा बढ़ रहा है।

हालांकि दोनों देश अभी भी पूरी तरह से रिश्ते तोड़ने से बचने की कोशिश कर रहे हैं और बयानबाज़ी में कुछ संयम दिख रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत तनावपूर्ण बनी हुई है।

ईरान की रणनीति व्यापक दिखाई देती है, जिसमें क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे और अमेरिकी प्रभाव को निशाना बनाकर दबाव बनाना शामिल है। दूसरी ओर, सऊदी अरब संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है—एक तरफ अपनी सुरक्षा और दूसरी तरफ क्षेत्रीय स्थिरता।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने संकेत दिया है कि अगर खाड़ी देशों की जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हमलों में नहीं होता, तो ईरान भी अपने हमले रोक सकता है। लेकिन ईरान के भीतर कट्टरपंथी गुट इस नरम रुख से सहमत नहीं हैं।

कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कमजोर पड़ चुका है और दोनों देशों के रिश्ते एक बार फिर अनिश्चितता और तनाव के दौर में पहुंच गए हैं।

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