100 और 500 रुपये के नोटों को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) के एक टेंडर के बाद राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कन्नौज सांसद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को निशाने पर लेते हुए कई सवाल उठाए हैं।
अखिलेश यादव ने क्या कहा?
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सवाल किया कि क्या अब देश की मुद्रा का भी निजीकरण होने जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में भी निजी भागीदारी को बढ़ावा दे रही है।
उन्होंने लिखा कि यदि देश की मुद्रा से जुड़ी प्रक्रिया भी आत्मनिर्भर नहीं होगी, तो आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा पर सवाल खड़े होंगे। साथ ही उन्होंने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रा छापने वाली कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने 100 और 500 रुपये के नोटों के लिए पॉलिमर शीट के निर्माण और आपूर्ति को लेकर वैश्विक कंपनियों से रुचि की अभिव्यक्ति (Expression of Interest – EOI) आमंत्रित की है।
यह कदम पॉलिमर आधारित मुद्रा नोटों के लिए आवश्यक कच्चे माल की संभावित खरीद प्रक्रिया की शुरुआती तैयारी माना जा रहा है।
क्या नोटों का निजीकरण हो रहा है?
फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि भारतीय मुद्रा की छपाई का निजीकरण किया जा रहा है।
यह टेंडर केवल पॉलिमर शीट की संभावित आपूर्ति के लिए कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित करने से संबंधित है। नोटों की छपाई और जारी करने की प्रक्रिया पहले की तरह भारतीय रिजर्व बैंक और उसकी अधिकृत इकाइयों के नियंत्रण में ही रहेगी।
पॉलिमर नोट क्या होते हैं?
पॉलिमर नोट विशेष प्रकार की प्लास्टिक आधारित सामग्री से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागज़ी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं, जल्दी खराब नहीं होते और इनमें उन्नत सुरक्षा फीचर्स जोड़े जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों पर अंकुश लगाने में मदद मिलती है।
अभी शुरुआती चरण में है प्रक्रिया
विशेषज्ञों के अनुसार, EOI जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि जल्द ही देश में पॉलिमर नोट चलन में आ जाएंगे। किसी भी बदलाव से पहले परीक्षण, तकनीकी मूल्यांकन, सुरक्षा जांच और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी। इसके बाद ही इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।


