दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत 30 दिन की नोटिस अवधि को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि इस नियम में किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि विवाह पंजीकरण की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और व्यक्तिगत कठिनाइयों के आधार पर इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
मामले में एक कपल ने 11 मई को मैरिज ऑफिसर के पास स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी का नोटिस दिया था। नियम के अनुसार उनकी शादी की तारीख 19 जून तय हुई थी, लेकिन उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया था कि 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि को कम करके उन्हें जल्दी शादी की अनुमति दी जाए, क्योंकि देरी से उन्हें परेशानी हो रही थी।
हालांकि जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने अपने फैसले में कहा कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, कानून में तय प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह 30 दिन की अवधि केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संसद द्वारा बनाई गई एक सोच-समझकर तय की गई कानूनी व्यवस्था है।
अदालत ने कहा कि अगर ऐसी छूट दी जाती है तो यह कानून के विपरीत होगा और अधिकारियों को निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने का निर्देश देने जैसा होगा।
अंत में कोर्ट ने याचिका को बिना किसी ठोस आधार के खारिज कर दिया।


