दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर किसानों, छात्रों और कर्मचारियों के आंदोलनों तक, इस स्थल ने कई महत्वपूर्ण जन अभियानों की मेजबानी की है।
साल 2026 में नीट परीक्षा पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया। 28 जून को वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शुरू की, जिसके बाद बड़ी संख्या में छात्र और युवा आंदोलन से जुड़े।
इस आंदोलन की तुलना 2011 के अन्ना हज़ारे आंदोलन से की जा रही है। हालांकि दोनों आंदोलनों के मुद्दे, राजनीतिक परिस्थितियां और उद्देश्य अलग हैं, लेकिन दोनों ने सार्वजनिक भागीदारी और राजनीतिक चर्चा को प्रभावित किया है।
दोनों आंदोलनों में मुख्य अंतर
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का कहना है कि अन्ना आंदोलन एक संगठित अभियान था, जबकि उनके अनुसार सीजेपी का आंदोलन अधिक स्वतःस्फूर्त तरीके से विकसित हुआ। उनका मानना है कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग बिना किसी पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे के शामिल हुए।
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के अनुसार, दोनों आंदोलनों में भाग लेने वालों की परिस्थितियां अलग थीं। उनका कहना है कि वर्तमान आंदोलन में शामिल कई छात्र और युवा संभावित प्रशासनिक या पेशेवर जोखिमों के बावजूद प्रदर्शन में भाग ले रहे हैं, जबकि 2011 का माहौल अपेक्षाकृत अलग था।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश केजरीवाल का मानना है कि दोनों आंदोलनों में भावनात्मक जुड़ाव एक महत्वपूर्ण तत्व रहा, हालांकि उनके अनुसार इस बार शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों ने लोगों को बड़ी संख्या में जोड़ने का काम किया।
सरकार की प्रतिक्रिया
विश्लेषकों के अनुसार, दोनों आंदोलनों के प्रति सरकारों की प्रतिक्रिया में अंतर देखने को मिला। कुछ का कहना है कि 2011 में सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत और समाधान की दिशा में अपेक्षाकृत जल्दी पहल की थी, जबकि वर्तमान आंदोलन में शुरुआती चरण में प्रशासन का रवैया अलग दिखाई दिया।
20 जुलाई को “चलो संसद” मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प तथा पुलिस कार्रवाई भी चर्चा का विषय बनी। इस घटना को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं।
युवाओं की भागीदारी
अन्ना आंदोलन की तरह इस आंदोलन में भी युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हालांकि इस बार सोशल मीडिया की भूमिका कहीं अधिक प्रभावशाली रही। ऑनलाइन अभियानों, लाइव वीडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आंदोलन को व्यापक स्तर पर समर्थन मिला।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि महिलाओं और छात्रों की सक्रिय भागीदारी इस आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता रही है।
मीडिया की भूमिका
मीडिया की भूमिका को लेकर भी व्यापक बहस हुई। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि 2011 में मुख्यधारा के मीडिया ने अन्ना आंदोलन को व्यापक कवरेज दी थी, जबकि वर्तमान आंदोलन की कवरेज को लेकर विभिन्न मत सामने आए हैं।
दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने आंदोलन से जुड़े वीडियो, रिपोर्ट और प्रतिक्रियाओं को व्यापक स्तर पर साझा किया, जिससे सोशल मीडिया पर यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा।अन्ना आंदोलन और सीजेपी का प्रदर्शन अलग-अलग मुद्दों और समय की उपज हैं। दोनों आंदोलनों में युवाओं की भागीदारी, जनसमर्थन और राजनीतिक प्रभाव जैसे कुछ समान तत्व दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी परिस्थितियां, संगठनात्मक संरचना, मीडिया परिदृश्य और सरकारी प्रतिक्रिया अलग र ही है। इन आंदोलनों का दीर्घकालिक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव समय के साथ अधिक स्पष्ट होगा।


