सत्य निकेतन हादसे के बाद सवाल: दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की इतनी कमी क्यों?

shikha verma
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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हुए बिल्डिंग हादसे ने राजधानी में छात्रों की आवास व्यवस्था और इमारतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में सात लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है, जिनमें छह छात्र बताए गए हैं। इस घटना ने खास तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की उपलब्धता पर बहस तेज कर दी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय से करीब 90 कॉलेज जुड़े हुए हैं, लेकिन इनमें से लगभग 20 कॉलेजों के पास ही अपने हॉस्टल हैं। पिछले 8 से 9 वर्षों में कोई बड़ा नया हॉस्टल प्रोजेक्ट पूरा होकर छात्रों के लिए शुरू नहीं हो सका है। कई परियोजनाएं अभी निर्माण, स्वीकृति या अन्य प्रक्रियाओं के स्तर पर हैं।

पुराने हॉस्टल पर बढ़ता दबाव

दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके कॉलेजों में सबसे ज्यादा हॉस्टल 1948 से लेकर 1970 के दशक के बीच बनाए गए थे। उस समय डीयू से जुड़े कॉलेजों की संख्या आज की तुलना में काफी कम थी। 1970 के दशक में करीब 40 कॉलेज विश्वविद्यालय से संबद्ध थे और उस दौर में भी लगभग 5 फीसदी छात्रों को ही हॉस्टल की सुविधा मिल पाती थी।

समय के साथ कॉलेजों और छात्रों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन हॉस्टल की क्षमता उसी अनुपात में नहीं बढ़ सकी। इसका सीधा असर दूसरे शहरों और राज्यों से दिल्ली पढ़ने आने वाले छात्रों पर पड़ता है।

आखिर नए हॉस्टल बनाना इतना मुश्किल क्यों?

डीयू के ज्यादातर कॉलेज दिल्ली के घनी आबादी वाले और पहले से विकसित इलाकों में स्थित हैं। ऐसे में नए हॉस्टल के लिए पर्याप्त खाली जमीन मिलना बड़ी चुनौती है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) से जमीन हासिल करने की प्रक्रिया और पुरानी इमारतों को हटाकर नया निर्माण करना भी लंबी और जटिल प्रक्रिया बन जाता है।

इसके अलावा हॉस्टल निर्माण के लिए कई स्तरों पर मंजूरियां लेनी पड़ती हैं। जमीन, पर्यावरण, बागवानी और अन्य संबंधित विभागों से अनुमति की जरूरत पड़ सकती है। सरकारी फंड और संस्थागत मंजूरियों पर निर्भरता के कारण कई परियोजनाओं में प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है।

मजबूरी में PG और किराए के कमरों का सहारा

हॉस्टल की कमी का सबसे बड़ा असर उन छात्रों पर पड़ता है जो पढ़ाई के लिए दिल्ली के बाहर से आते हैं। ऐसे छात्रों को अक्सर PG, किराए के कमरों या निजी हॉस्टल का सहारा लेना पड़ता है।

सवाल सिर्फ किराए का नहीं, सुरक्षा का भी है। छात्र जब किसी PG में कमरा लेते हैं तो आम तौर पर उनसे किराया, पहचान पत्र और अन्य दस्तावेज लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें इमारत की सुरक्षा से जुड़ी पूरी जानकारी कितनी मिलती है, यह बड़ा सवाल है।

क्या छात्रों को बताया जाता है कि इमारत की आखिरी बार सुरक्षा जांच कब हुई थी? क्या उसके पास फायर NOC है? आपात स्थिति में बाहर निकलने का रास्ता कहां है? एक मंजिल पर कितने लोगों के रहने की अनुमति है? इमारत पर कितना विद्युत भार स्वीकृत है और कितनी मंजिलों के निर्माण की अनुमति है?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब और पारदर्शी सुरक्षा व्यवस्था के अभाव में छात्रों की सुरक्षा पर खतरा बना रहता है।

हॉस्टल की कमी के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी

सत्य निकेतन हादसे के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि राजधानी में छात्रों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित आवास की व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाए। डीयू में हॉस्टल की सीमित संख्या के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को निजी आवास पर निर्भर रहना पड़ता है।

ऐसे में सिर्फ नए हॉस्टल बनाना ही नहीं, बल्कि PG और किराए की इमारतों में फायर सेफ्टी, स्ट्रक्चरल ऑडिट, आपातकालीन निकास और क्षमता मानकों की नियमित जांच सुनिश्चित करना भी जरूरी है। छात्रों के लिए सुरक्षित आवास की उपलब्धता उनकी शिक्षा और भविष्य जितनी ही महत्वपूर्ण है।

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