किसी भी राज्य की शासन व्यवस्था की पारदर्शिता और निष्पक्षता का अंदाजा उसकी भर्ती प्रक्रिया से लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या एक गरीब किसान के बेटे और किसी प्रभावशाली परिवार के उम्मीदवार को प्रतियोगी परीक्षा में समान अवसर मिलता है? उत्तर प्रदेश में पिछले दो शासनकालों की भर्ती व्यवस्था की तुलना करते हुए यह दावा किया जाता रहा है कि प्रदेश ने सिफारिश और अनियमितताओं की शिकायतों से आगे बढ़कर मेरिट आधारित चयन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
साक्षात्कार व्यवस्था को लेकर उठते रहे सवाल
2012 से 2017 के बीच तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल को लेकर भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता पर विपक्ष और अभ्यर्थियों की ओर से समय-समय पर सवाल उठते रहे। खासतौर पर समूह ‘ग’ और ‘घ’ के पदों पर साक्षात्कार में दिए जाने वाले अंकों को लेकर यह तर्क दिया गया कि इससे लिखित परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों की मेरिट प्रभावित हो सकती है।
आलोचकों के मुताबिक, साक्षात्कार में अंकों के व्यापक अंतर की संभावना चयन प्रक्रिया को विवादित बना सकती थी। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं में समान अवसर और पारदर्शिता को लेकर अभ्यर्थियों के बीच असंतोष पैदा हुआ।
आयोग और भर्तियों को लेकर विवाद
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की विभिन्न भर्तियों को लेकर भी उस दौर में विवाद सामने आए। आरक्षण व्यवस्था, प्रश्नपत्रों की कथित अनियमितताओं और ओएमआर शीट से जुड़े आरोपों के चलते प्रतियोगी छात्रों ने आंदोलन किए। कई भर्ती प्रक्रियाएं न्यायिक प्रक्रिया में भी पहुंचीं।
इन विवादों का सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ा, जिन्हें चयन प्रक्रिया पूरी होने में लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि, इन मामलों से जुड़े आरोपों और घटनाओं का अंतिम मूल्यांकन संबंधित जांच और न्यायिक फैसलों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
2017 के बाद भर्ती प्रक्रिया में बदलाव
2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कई प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव किए गए। समूह ‘ग’ और ‘घ’ के पदों पर साक्षात्कार समाप्त करना इस दिशा में प्रमुख कदमों में शामिल रहा।
इस व्यवस्था के तहत लिखित परीक्षा को चयन प्रक्रिया का प्रमुख आधार बनाया गया। सरकार की ओर से इसे सिफारिश और व्यक्तिगत प्रभाव की संभावनाओं को कम करने तथा अभ्यर्थियों को समान अवसर देने की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तकनीक के जरिए बढ़ाई गई निगरानी
परीक्षा व्यवस्था में तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया। परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी, अभ्यर्थियों का बायोमीट्रिक सत्यापन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षित कोडिंग और ओएमआर शीट की कंप्यूटरीकृत स्कैनिंग जैसे उपाय लागू किए गए।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य नकल, फर्जी अभ्यर्थियों और सॉल्वर गैंग जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। सरकार ने परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के खिलाफ कड़े कानूनी प्रावधान भी लागू किए हैं, ताकि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं में शामिल लोगों पर प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
सरकारी सेवाओं में डिजिटल व्यवस्था का विस्तार
भर्ती के अलावा कर्मचारियों की सेवा संबंधी प्रक्रियाओं में भी डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। मानव संपदा पोर्टल के माध्यम से कर्मचारियों से जुड़े सेवा रिकॉर्ड, स्थानांतरण और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने की दिशा में काम हुआ है।
सरकार का दावा है कि डिजिटल व्यवस्था से मानवीय हस्तक्षेप कम हुआ है और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में जवाबदेही बढ़ी है। इसका उद्देश्य सिफारिश और व्यक्तिगत प्रभाव की संभावनाओं को कम करना है।
लाखों नियुक्तियों का सरकार ने किया दावा
योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा, चिकित्सा-स्वास्थ्य और अन्य विभागों में बड़ी संख्या में नियुक्तियां किए जाने का दावा किया गया है। सरकार इन नियुक्तियों को पारदर्शी और मेरिट आधारित भर्ती व्यवस्था का परिणाम बताती है।
हालांकि, किसी भी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता का अंतिम आकलन चयन नियमों, परिणामों, न्यायिक समीक्षा और उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना अधिक उचित होगा।
पारदर्शी भर्ती व्यवस्था अभी भी बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और विवादमुक्त बनाना लगातार जारी रहने वाली प्रक्रिया है। परीक्षा में तकनीक का इस्तेमाल और सख्त कानून व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ भर्ती संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्ष जांच और समयबद्ध परिणाम भी जरूरी हैं।
युवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही है कि सरकारी नौकरी की प्रक्रिया में उन्हें बिना भेदभाव समान अवसर मिले और चयन उनकी योग्यता के आधार पर हो। उत्तर प्रदेश में भर्ती व्यवस्था में किए गए बदलावों का वास्तविक मूल्यांकन इसी कसौटी पर किया जाना चाहिए।


