गंगा में इफ़्तार पर बवाल, क्या हैं आरोप और क्या कहता है क़ानून?

shikha verma
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मार्च 2026 में वाराणसी के नमो घाट पर नाव में किए गए एक इफ़्तार कार्यक्रम ने राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ मुस्लिम युवक गंगा नदी में नाव पर इफ़्तार करते दिखाई दिए। आरोप लगा कि उन्होंने बिरयानी खाई और चिकन की हड्डियाँ गंगा में फेंकीं, जिससे धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं।

इस मामले में 14 मुस्लिम युवकों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई और उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। लगभग 60 दिन जेल में रहने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट से उन्हें ज़मानत मिली।

क्या है पूरा मामला?

16 मार्च 2026 को वाराणसी के कोतवाली थाने में बीजेपी युवा मोर्चा के नेता रजत जायसवाल की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि युवकों ने “माँ गंगा की पवित्र धारा में नाव पर बिरयानी खाकर और अवशेष फेंककर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया।”

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया, जिनमें धार्मिक भावनाएँ आहत करना, सामाजिक सद्भाव बिगाड़ना, सार्वजनिक उपद्रव और जलाशय को दूषित करना जैसी धाराएँ शामिल थीं। साथ ही जल प्रदूषण निवारण अधिनियम 1974 की धारा 24 भी लगाई गई।

बाद में क्यों हटाई गई जल प्रदूषण की धारा?

जाँच के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि जल प्रदूषण अधिनियम की धारा 24 के तहत अपराध साबित करने लायक पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, इसलिए वह धारा हटा दी गई।

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक़ धारा 24 के तहत यह साबित करना ज़रूरी होता है कि नदी में “हानिकारक या प्रदूषणकारी पदार्थ” डाला गया था। इसके लिए ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्य चाहिए होते हैं। जबकि BNS की धारा 279 में “सार्वजनिक जल स्रोत को दूषित करने” की परिभाषा अपेक्षाकृत व्यापक है।

विवादित बनी धारा 308(5)

गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने मामले में BNS की धारा 308(5) भी जोड़ दी, जो जबरन वसूली और डराकर संपत्ति लेने से जुड़ी गैर-जमानती धारा है। इसी धारा के कारण अभियुक्तों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।

पुलिस का दावा था कि नाविकों ने बयान दिया कि उनकी नाव जबरन ली गई थी। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने इस दावे पर संदेह जताया और कहा कि नाविकों की कहानी में कई सवाल खड़े होते हैं।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़मानत देते समय कहा कि यदि गंगा में नॉनवेज खाना और हड्डियाँ फेंकना सही है, तो इससे हिंदू समुदाय की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। लेकिन अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियुक्तों ने अपने हलफ़नामे में खेद व्यक्त किया है और भविष्य में ऐसी गतिविधियों से दूर रहने का आश्वासन दिया है।

कोर्ट ने यह भी माना कि ज़मानत याचिका में अपराध स्वीकार करना आवश्यक नहीं होता, फिर भी अभियुक्तों की ओर से माफ़ीनामा दाख़िल किया गया।

पुलिस के पास क्या सबूत हैं?

बीबीसी से बातचीत में एसीपी विजय प्रताप सिंह ने कहा कि पुलिस के पास वीडियो और कुछ लोगों के बयान हैं। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि चिकन की हड्डियाँ गंगा में फेंके जाने का कोई प्रत्यक्ष फ़ॉरेंसिक सबूत नहीं है।

नगर निगम ने भी स्पष्ट किया कि गंगा में नाव पर क्या खाना है और क्या नहीं, इसे लेकर कोई विशेष नियम मौजूद नहीं है।

परिवारों में डर और चुप्पी

गिरफ़्तार युवकों के परिवारों ने मीडिया से बात करने से परहेज़ किया। उनका कहना था कि इस मामले को “हिंदू-मुस्लिम विवाद” का रूप दे दिया गया और इससे उनके बच्चों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

परिवारों का कहना है कि अगर युवकों की कोई “साजिश” होती, तो वे ख़ुद अपने सोशल मीडिया अकाउंट से वीडियो साझा नहीं करते।

शिकायतकर्ता का पक्ष

बीजेपी युवा मोर्चा नेता रजत जायसवाल का कहना है कि युवकों ने जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई। उन्होंने आरोप लगाया कि वीडियो सोशल मीडिया पर फ़लस्तीन के झंडों के साथ साझा किए गए, जिससे मामला और भड़क गया।

आगे क्या?

मामले में अब तक चार्जशीट दाख़िल नहीं हुई है। पुलिस की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोपों के समर्थन में कितने ठोस सबूत मौजूद हैं और अदालत इस केस को किस दिशा में ले जाती है।

यह मामला धार्मिक आस्था, सोशल मीडिया, पुलिस कार्रवाई और क़ानूनी प्रक्रिया—इन सभी के बीच उलझा हुआ दिखाई देता है।

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