Donald Trump ने हाल ही में दावा किया कि अमेरिका और Iran के बीच “अच्छी और उपयोगी बातचीत” हुई है। हालांकि, ईरान ने इस दावे को तुरंत खारिज कर दिया। ईरानी अधिकारियों ने साफ कहा कि ऐसी कोई बातचीत हुई ही नहीं, और एक सैन्य प्रवक्ता ने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका “खुद से ही बातचीत कर रहा है।”
यह मामला सिर्फ़ बयानबाज़ी का नहीं, बल्कि गहरे अविश्वास का संकेत देता है।
अविश्वास की जड़ें गहरी क्यों हैं?
United States, Israel और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। पिछले साल दो बार बातचीत की कोशिशों से उम्मीद जगी थी, लेकिन दोनों ही मौकों के बाद ईरान पर हमले हुए।
ईरान के नजरिए से देखें तो बातचीत ने तनाव कम करने के बजाय खतरा बढ़ाया। यही वजह है कि इस बार ट्रंप के प्रस्ताव को तेहरान शक की नजर से देख रहा है।
सख्त बयानबाज़ी के पीछे रणनीति
हालांकि ईरान का लहजा सख्त है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह बातचीत के पूरी तरह खिलाफ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रुख़ उसकी ‘बर्गेनिंग पावर’ बढ़ाने की रणनीति भी हो सकता है।
ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा है कि फिलहाल देश का ध्यान “आत्मरक्षा” पर है और अभी बातचीत का इरादा नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा।
आंतरिक दबाव भी बड़ी वजह
ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian अपेक्षाकृत उदार रुख़ रखते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में अमेरिका से बातचीत का समर्थन करना उनके लिए आसान नहीं है।
देश के भीतर कुछ समूह समझौते के खिलाफ हैं और मौजूदा तनाव को सत्ता परिवर्तन के अवसर के रूप में देखते हैं। वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को डर है कि किसी समझौते के बाद सरकार आंतरिक स्तर पर और सख्ती बढ़ा सकती है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ और दबाव की राजनीति
Strait of Hormuz पर नियंत्रण ईरान के लिए एक बड़ा रणनीतिक हथियार है। इस मार्ग के जरिए दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है। इसे प्रभावित करने की क्षमता ईरान को वैश्विक स्तर पर दबाव बनाने का मौका देती है।
प्रस्ताव में क्या है और समस्या कहां है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमताओं और क्षेत्रीय सहयोगियों को समर्थन पर सख्त सीमाएं लगाने की बात शामिल है। बदले में प्रतिबंधों में राहत और सिविल न्यूक्लियर सहयोग की पेशकश की गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ‘भरोसे’ का है।
2015 में हुआ परमाणु समझौता, जिसमें कई विश्व शक्तियां शामिल थीं, बाद में अमेरिका के इससे अलग होने के कारण टूट गया। इस अनुभव ने तेहरान में गहरा अविश्वास पैदा किया है।
