ट्रम्प को भारत का कड़ा संदेश : पुतिन, शी जिनपिंग और पेजेशकियन संग मोदी ने बनाया नया ग्लोबल समीकरण

Nikhil Malhotra
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ऐसे समय हो रही है जब यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर पश्चिमी देशों का दबाव लगातार बना हुआ है। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति…

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ऐसे समय हो रही है जब यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर पश्चिमी देशों का दबाव लगातार बना हुआ है। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मौजूदगी पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाती है। भारत ने रूस और ईरान के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को बनाए रखते हुए यह संकेत दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति-समूह तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली लगातार रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर जोर देती रही है

गलवान घाटी विवाद के बाद भारत और चीन के रिश्तों में आई खटास के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, द्विपक्षीय व्यापार और संबंधों को सामान्य बनाने जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रह सकते हैं। भारत की कोशिश एक ओर सीमा पर स्थिरता बनाए रखने की है, तो दूसरी ओर चीन के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर भी संतुलित रणनीति अपनाने की है।

ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन दोनों देशों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है

ब्रिक्स सम्मेलन का एक अहम मुद्दा सदस्य देशों के बीच व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में बढ़ावा देना हो सकता है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को आपस में जोड़ने जैसे प्रस्ताव भी चर्चा का हिस्सा हैं। अगर ब्रिक्स देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो लंबे समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका को चुनौती देने की कोशिश मजबूत हो सकती है।

हालांकि, इसे तत्काल डॉलर के विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। इसके लिए ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत वित्तीय ढांचा, भरोसेमंद भुगतान प्रणाली और व्यापक आर्थिक समन्वय की जरूरत होगी

अमेरिका की ‘America First’ नीति और टैरिफ आधारित व्यापार रणनीति के बीच ब्रिक्स देशों का आपसी आर्थिक सहयोग वॉशिंगटन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है

1. डॉलर के वर्चस्व को चुनौती

यदि ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था मजबूत होती है, तो अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ सकता है

2. रूस और ईरान पर प्रतिबंधों का असर

अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत, चीन और अन्य देश रूस के साथ ऊर्जा एवं व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं। ईरान के साथ भी भारत के रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं। इससे यह संदेश जाता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का वैश्विक प्रभाव हर देश पर एक जैसा नहीं है

3. रूस और चीन को अलग-थलग करने की रणनीति पर सवाल

अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से रूस और चीन के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे समय में पुतिन और शी जिनपिंग का भारत में एक ही बहुपक्षीय मंच पर होना वैश्विक शक्ति-संतुलन की जटिलता को दिखाता है

4. टैरिफ नीति पर दबाव

अमेरिका की टैरिफ नीति के बीच ब्रिक्स देशों का बहुपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग पर जोर ट्रम्प प्रशासन की एकतरफा व्यापार नीति के लिए चुनौती बन सकता है। भारत जैसे बड़े बाजार और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की भूमिका इसमें विशेष महत्व रखती है

भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व क्षमता दिखाने का अवसर भी है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ संवाद के रास्ते भी खुले रख रहा है। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता बनकर उभर रहा है

स्रोत: readnownews.in

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