रियाद पर हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए हमलों के बाद पाकिस्तान की ओर से आई शुरुआती चुप्पी ने सबको चौंका दिया है। हमेशा खुद को सऊदी अरब और हरमीन शरीफैन (पवित्र…
रियाद पर हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए हमलों के बाद पाकिस्तान की ओर से आई शुरुआती चुप्पी ने सबको चौंका दिया है। हमेशा खुद को सऊदी अरब और हरमीन शरीफैन (पवित्र स्थलों) का सबसे बड़ा रक्षक बताने वाला इस्लामाबाद इस बार न तो खुलकर सामने आया और न ही उसने कोई ठोस सैन्य समर्थन का ऐलान किया
हालांकि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि सऊदी अरब पर हमलों का जवाब देना हर बार उसी तरीके से जरूरी नहीं है। उन्होंने मक्का समझौते को एक बड़ा डिटरेंट बताया और कहा कि अगर सऊदी अरब पर बेवजह हमला होता है या यमन का तनाव वहां तक पहुंचता है, तो यह समझौता अपने आप लागू हो जाएगा। दूसरी ओर, कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह हिचकिचाहट उसकी विदेश नीति और सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है
उल्लेखनीय है कि हाल ही में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे मक्का डिफेंस एग्रीमेंट या मक्का पैक्ट नाम दिया गया था। इस समझौते के मुताबिक यदि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो वह तीनों देशों पर माना जाएगा
पाकिस्तान का इस मुद्दे पर बैकफुट पर आना और सीधा सैन्य रुख न अपनाना कई रणनीतिक कारणों से जुड़ा है। दरअसल, यमन के हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और इस्लामाबाद इस समय ईरान के साथ नया तनाव मोल लेने की स्थिति में नहीं है। इसके साथ ही पाकिस्तान खुद गहरे आर्थिक संकट, महंगाई और घरेलू आतंकवाद से जूझ रहा है। ऐसे में किसी बाहरी युद्ध या मध्य पूर्व के संकट में फंसना उसके लिए घातक साबित हो सकता है।
यमन संकट के शुरुआती दिनों में भी पाकिस्तान की संसद ने तटस्थ रहने का प्रस्ताव पारित किया था, जिसने सऊदी अरब को काफी निराश किया था। इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता दिख रहा है
रियाद लंबे समय से पाकिस्तान को संकट के समय अपने विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में देखता आया है। हालांकि, हमलों के वक्त पाकिस्तान की ऐसी टालमटोल वाली नीति से रियाद में यह संदेश जा रहा है कि इस्लामाबाद केवल वित्तीय मदद लेने तक ही सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया, तो भविष्य में सऊदी अरब अपनी सुरक्षा और निवेश रणनीतियों के लिए अन्य वैश्विक और क्षेत्रीय सहयोगियों की ओर अपना झुकाव बढ़ा सकता है
स्रोत: readnownews.in


