गंगा में इफ्तार केस, क्या था मामला, कोर्ट ने जमानत देते हुए क्या कहा?

shikha verma
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वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ्तार करने और कथित रूप से मुर्गी की हड्डियां नदी में फेंकने के मामले ने कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दिया है। इस घटना के बाद पुलिस ने 14 युवकों को गिरफ्तार किया था, जिनमें से 8 को हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो अलग-अलग पीठों ने जमानत दे दी है। बाकी मामलों पर सुनवाई अभी जारी है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि गंगा नदी का देश के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष महत्व है और यदि किसी कृत्य से धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो उसे कानूनी दृष्टि से गंभीर माना जा सकता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी केवल जमानत याचिका पर आधारित थी और मामले के अंतिम निष्कर्ष का संकेत नहीं है।

इस केस में आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 सहित कई धाराएं लगाई गई हैं, जिनमें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, सार्वजनिक जल स्रोत को दूषित करना और अन्य आरोप शामिल हैं। पुलिस का दावा है कि नाव पर आयोजित इफ्तार के दौरान कुछ गतिविधियों से धार्मिक भावनाएं प्रभावित हुईं।

वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू “आपराधिक मंशा” यानी इरादे का होता है। कई विशेषज्ञों ने कहा है कि यह देखना जरूरी है कि क्या वास्तव में जानबूझकर किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करने का उद्देश्य था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि किसी भी धार्मिक अपमान के मामले में मंशा और परिस्थितियों का गहन विश्लेषण जरूरी है। केवल अनजाने में या बिना दुर्भावनापूर्ण इरादे के किए गए कृत्य इस धारा के तहत अपराध नहीं माने जाते।

इसी तरह, “पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन” के तहत नदियों जैसे प्राकृतिक संसाधनों को सार्वजनिक संपत्ति माना गया है और राज्य का कर्तव्य है कि वह उनकी रक्षा करे। यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और आरोपियों पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन अदालत में आगे की सुनवाई के बाद ही हो सकेगा।

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