बिहार में राज्यसभा चुनाव में एनडीए के सभी पांच उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, जिसमें जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार भी शामिल हैं। नीतीश पहले छह बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और अब उम्र, स्वास्थ्य और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्यसभा में लौटे हैं।
चुनाव के दिन नीतीश कुमार पटना डीएम ऑफिस के कैंपस का निरीक्षण कर रहे थे, जबकि बिहार विधानसभा में वोटिंग जारी थी।
एनडीए के अन्य चार विजेता उम्मीदवार थे: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेन्द्र कुशवाहा, बीजेपी के शिवेश राम और जेडीयू के रामनाथ ठाकुर।
महागठबंधन के पक्ष में स्थिति चुनौतीपूर्ण रही। कांग्रेस के तीन विधायक—सुरेन्द्र प्रसाद (वाल्मीकिनगर), मनोहर प्रसाद सिंह (मनिहारी) और मनोज बिस्वास (फारबिसगंज)—वोटिंग में शामिल नहीं हुए। इसके अलावा राजद के फ़ैसल रहमान भी अनुपस्थित रहे।
फ़ैसल रहमान ने बताया कि व्यक्तिगत कारणों से उन्हें दिल्ली जाना पड़ा, जबकि कांग्रेस प्रवक्ता ने दावा किया कि उनके विधायक “अपहरण” के कारण वोटिंग से दूर रहे। इससे महागठबंधन को जीत के लिए जरूरी 41 वोटों तक पहुंचना मुश्किल हो गया।
एआईएमआईएम और बसपा के कुछ विधायक महागठबंधन के साथ थे, लेकिन कांग्रेस के अनुपस्थित होने और महागठबंधन के एक विधायक के अलग रुख के कारण राजद उम्मीदवार अमरेन्द्र धारी सिंह हार गए।
विशेषज्ञों के अनुसार, कांग्रेस के इन तीन विधायकों का हालिया राजनीतिक इतिहास यह दर्शाता है कि ये ‘नए नेता’ हैं और पार्टी की केंद्रीय रणनीति के अनुरूप काम नहीं कर रहे थे।
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार की राजनीति में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि उन्हें अब राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर अपनी पहचान और ‘विकास पुरुष’ की छवि बनाए रखने की चुनौती होगी।
इस चुनाव में एनडीए ने जातिगत और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार चुने—एक सवर्ण, दो पिछड़ा, एक दलित और एक अति पिछड़ा।
