उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दलों के नेता अपने-अपने हिसाब से चुनावी गणित लगाने लगे हैं। कहीं टिकट के लिए दावेदारी शुरू…
उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दलों के नेता अपने-अपने हिसाब से चुनावी गणित लगाने लगे हैं। कहीं टिकट के लिए दावेदारी शुरू हो गई है, कहीं जनसंपर्क अभियान चल रहे हैं और कहीं बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की कवायद चल रही है। लेकिन कांग्रेस को देखकर लगता है कि शायद उसे अभी तक किसी ने बताया ही नहीं कि 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
दस साल से सत्ता से बाहर रहने के बाद भी अगर कोई विपक्षी पार्टी चुनाव की तैयारी में सुस्त दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर सत्ता में वापसी की इच्छा है या केवल विपक्ष की कुर्सी को ही स्थायी पता मान लिया गया है? कांग्रेस सरकार को घेरने में पीछे नहीं रहना चाहती। बयान आते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट होती हैं और सरकार से सवाल भी पूछे जाते हैं।
लेकिन चुनाव का असली सवाल यह है कि बूथ पर कांग्रेस का आदमी कौन है? क्योंकि चुनाव फेसबुक की टाइमलाइन पर नहीं, बूथ की लाइन में लड़ा जाता है
सोशल मीडिया पर हजारों लाइक मिल जाएं, लेकिन मतदान केंद्र पर कार्यकर्ता न मिले तो राजनीति में लाइक का वोट में रूपांतरण थोड़ा मुश्किल काम हैं। सत्ता से बाहर रहना किसी राजनीतिक दल के लिए केवल नुकसान नहीं होता। विपक्ष में रहने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सरकार की हर कमजोरी को जनता के बीच मुद्दा बनाया जा सकता है और संगठन को गांव-गांव मजबूत किया जा सकता है। कांग्रेस के पास दस साल का लंबा समय रहा है। लेकिन सवाल यह है कि इन दस वर्षों में संगठन कितना मजबूत हुआ।
यदि बूथ समितियां कागज पर ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई दें, यदि कार्यकर्ता चुनाव के समय ही याद आएं और यदि जिला तथा ब्लॉक स्तर की राजनीति ही संगठन की अंतिम मंजिल बन जाए, तो फिर सत्ता में वापसी का सपना आखिर किस संगठन के भरोसे देखा जा रहा है। भाजपा के पास सरकार होने का लाभ है, संगठन का ढांचा है और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव भी। वह बूथ से लेकर विधानसभा तक चुनावी गणित बैठाने में जुटी है।
उधर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह भाजपा को चुनौती देने से पहले खुद के भीतर की चुनौतियों से जूझती नजर आती है
किसे टिकट मिलेगा,कौन किसके साथ है? किसका गुट मजबूत है,कौन प्रदेश अध्यक्ष के करीब है,कौन दिल्ली तक पहुंच रखता है,इन सवालों के बीच असली सवाल कहीं पीछे न छूट जाए,जनता किसके साथ है? चुनाव नजदीक आते ही ‘माननीय दावेदार’ पैदा होंगे भारतीय राजनीति की एक खूबसूरत परंपरा है चुनाव आते ही पार्टी कार्यालयों में दावेदारों की संख्या बढ़ जाती है। जो कार्यकर्ता पांच साल तक संगठन की बैठक में दिखाई नहीं दिया, वह चुनाव आते ही क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नेता बन जाता है।
जो पांच साल जनता के बीच नहीं गया, उसके पास अचानक पांच हजार समर्थकों की सूची आ जाती है। और जो पार्टी के कार्यक्रमों में कुर्सियां गिनता रहा, वह टिकट की दौड़ में खुद को जननेता साबित करने लग जाता है। कांग्रेस अगर इस परंपरा को बदलना चाहती है तो उसे टिकट से पहले संगठन और दावेदारी से पहले जमीन देखनी होगी। भाजपा की हैट्रिक अभी तय नहीं, लेकिन रास्ता खुला है, यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2027 में भाजपा की हैट्रिक निश्चित है। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम मतदान के बाद ही तय होता है
लेकिन राजनीति में विरोधी की कमजोरी भी एक ताकत होती है। यदि कांग्रेस बूथ स्तर तक सक्रिय नहीं होती, कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरती, स्थानीय मुद्दों को लगातार आंदोलन में नहीं बदलती और गुटीय राजनीति से ऊपर नहीं उठती, तो भाजपा के लिए तीसरी पारी की राह आसान जरूर हो सकती है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि भाजपा को केवल भाषणों से नहीं, संगठन से चुनौती दी जा सकती है। कांग्रेस के लिए अलार्म बज चुका है,अब समय चुनाव आएगा तो देखेंगे वाली राजनीति का नहीं है
उत्तराखंड की जनता को केवल सरकार का विकल्प नहीं चाहिए, उसे विश्वसनीय विपक्ष और स्पष्ट राजनीतिक विकल्प भी चाहिए। कांग्रेस यदि 2027 में सत्ता में वापसी चाहती है तो उसे सबसे पहले अपने संगठन की हाजिरी लगानी होगी।
कितने बूथ सक्रिय हैं? कितने बूथों पर कार्यकर्ता नियमित संपर्क में हैं?कितने गांवों में पार्टी की मौजूदगी है? कितने युवा पार्टी से जुड़े हैं? कितने पुराने कार्यकर्ता अभी भी सक्रिय हैं?और सबसे महत्वपूर्ण क्या कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने की रणनीति है या केवल चुनाव लड़ने की इच्छा? क्योंकि इच्छा से सरकार नहीं बनती। सरकार बनाने के लिए संगठन चाहिए, कार्यकर्ता चाहिए, बूथ चाहिए और जनता का भरोसा चाहिए।
वरना कहीं ऐसा न हो कि 2027 में कांग्रेस फिर चुनाव परिणाम के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करे- हम जनता का जनादेश स्वीकार करते हैं और संगठन की समीक्षा करेंगे। और भाजपा कहे- धन्यवाद उत्तराखंड, तीसरी बार अब फैसला कांग्रेस को करना है,वह 2027 का चुनाव लड़ेगी या सिर्फ उसका विश्लेषण करेगी
स्रोत: www.thehindipioneer.com


