उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता और रोजगार से जुड़ी योजनाओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो रही है। बिहार की ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ ने इस चर्चा को और हवा दी है। सवाल यह है कि अगर बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं को आर्थिक मदद देने वाली कोई बड़ी योजना लागू की जाती है, तो राज्य के खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा?
बिहार सरकार की ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत हर परिवार की एक महिला को स्वरोजगार शुरू करने के लिए शुरुआती तौर पर 10 हजार रुपये की सहायता दी जाती है। बेहतर प्रदर्शन करने वाले रोजगार को आगे बढ़ाने के लिए 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता का प्रावधान भी है। सितंबर 2025 में योजना की शुरुआत के दौरान 75 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये यानी कुल 7,500 करोड़ रुपये की राशि DBT के जरिए दी गई थी। बाद में लाभार्थियों की संख्या 1.56 करोड़ तक पहुंची और 15,600 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए।
यूपी में कितना हो सकता है खर्च?
उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची में करीब 13.39 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें लगभग 6.09 करोड़ महिला मतदाता हैं। हालांकि, यह संख्या योजना की संभावित पात्र महिलाओं की वास्तविक संख्या नहीं मानी जा सकती, क्योंकि किसी भी योजना में पात्रता के लिए अलग-अलग शर्तें तय हो सकती हैं।
सिर्फ एक काल्पनिक गणना के तौर पर यदि 6.09 करोड़ महिलाओं को 10 हजार रुपये की पहली सहायता दी जाए, तो खर्च करीब 60,900 करोड़ रुपये बैठेगा।
अगर यही राशि बढ़ाकर 50 हजार रुपये प्रति महिला कर दी जाए, तो संभावित खर्च करीब 3.045 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यानी यह रकम उत्तर प्रदेश के 2026-27 के कुल बजट 9.13 लाख करोड़ रुपये का लगभग एक-तिहाई होगी। यूपी के 2026-27 बजट में कुल व्यय 9,12,696 करोड़ रुपये और शुद्ध व्यय 8,50,901 करोड़ रुपये अनुमानित है।
यदि किसी योजना में पात्र महिलाओं को चरणबद्ध तरीके से 2 लाख रुपये तक की सहायता देने का प्रावधान हो और यही 6.09 करोड़ का आधार मान लिया जाए, तो सैद्धांतिक अधिकतम राशि 12.18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, वास्तविक सरकारी खर्च पात्रता, चरणों और भुगतान की शर्तों पर निर्भर करेगा।
अखिलेश यादव के बयान से बढ़ी राजनीतिक चर्चा
महिलाओं को आर्थिक सहायता देने का मुद्दा अब राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन चुका है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव महिलाओं के लिए ‘स्त्री सम्मान-समृद्धि योजना’ के तहत सालाना 40 हजार रुपये देने की बात कह चुके हैं। ऐसे में बिहार की योजना और यूपी की संभावित योजनाओं को लेकर राजनीतिक दलों के बीच वादों की प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।
2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में महिला मतदाताओं को ध्यान में रखकर आर्थिक सहायता, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े वादे चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
असली चुनौती सिर्फ पैसा नहीं
ऐसी किसी भी योजना को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती केवल बजट नहीं होगी। सरकार को यह भी तय करना होगा कि लाभार्थी कौन होंगे, पात्रता कैसे निर्धारित होगी, एक परिवार से कितनी महिलाओं को लाभ मिलेगा और फर्जी या डुप्लीकेट दावों को कैसे रोका जाएगा।
इसके अलावा, अगर योजना का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार से जोड़ना है तो केवल नकद सहायता पर्याप्त नहीं होगी। प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच, कच्चा माल, बैंकिंग सुविधा, डिजिटल भुगतान और कारोबार के लिए मार्गदर्शन भी जरूरी होगा।
बिहार मॉडल यूपी में कितना व्यावहारिक?
बिहार की योजना उत्तर प्रदेश के लिए एक उदाहरण जरूर हो सकती है, लेकिन दोनों राज्यों के आकार और वित्तीय जरूरतों में बड़ा अंतर है। इसलिए किसी योजना को सीधे लागू करने के बजाय यूपी की आबादी, बजट, पात्र लाभार्थियों और राज्य की वित्तीय क्षमता के आधार पर अलग मॉडल तैयार करना होगा।
उत्तर प्रदेश के 2026-27 बजट में सरकार ने ₹64,458 करोड़ का राजस्व अधिशेष अनुमानित किया है, जबकि राजकोषीय घाटा ₹1,18,481 करोड़ रहने का अनुमान है। इसलिए किसी बड़े प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण कार्यक्रम के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की जरूरत पड़ेगी।
महिला सशक्तिकरण के लिए चाहिए लंबी रणनीति
महिलाओं को सीधे आर्थिक मदद देने से तत्काल राहत या स्वरोजगार शुरू करने में मदद मिल सकती है, लेकिन लंबे समय में महिला सशक्तिकरण के लिए रोजगार, कौशल विकास, शिक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल, बाजार और वित्तीय पहुंच को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।
इसलिए चुनाव से पहले होने वाली घोषणाओं का असली परीक्षण सिर्फ यह नहीं होगा कि कितने रुपये दिए जाएंगे, बल्कि यह भी होगा कि पैसा कहां से आएगा, कितनी महिलाओं को मिलेगा और योजना लंबे समय तक कैसे चलेगी।


