पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में रहने वाले नवाब मीर जाफ़र के वंशज इन दिनों एक गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद परिवार के 300 से अधिक लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, जिससे उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
89 वर्षीय सैय्यद आमिर मिर्ज़ा, जो इस परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य हैं, इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख बताते हैं। उनका कहना है कि वे जन्म से ही भारत के नागरिक हैं और उन्हें केंद्र सरकार से पेंशन भी मिलती है, फिर भी उन्हें नागरिक न मानना बेहद तकलीफ़देह है।
उनके बेटे के अनुसार, आमिर मिर्ज़ा हमेशा हर चुनाव में सबसे पहले मतदान करने जाते थे, और अब उनका नाम हट जाना उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने जैसा है।
इसी परिवार के 82 वर्षीय सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा, जिन्हें “छोटे नवाब” कहा जाता है, कहते हैं कि उन्होंने जीवनभर मतदान किया है, लेकिन पहली बार उनका नाम सूची से हटा है। वे सवाल करते हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या अपराध किया है कि उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठ गया।
इतिहासकारों के अनुसार, 1947 में मुर्शिदाबाद के नवाब वासिफ़ अली मिर्ज़ा ने इस क्षेत्र को भारत में शामिल करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि मीर जाफ़र का नाम इतिहास में विवादित रहा है, लेकिन उनके वंशजों का बंगाल के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वहीं, इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई है। बीजेपी ने इसके लिए राज्य सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि पूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और इसे सुधारने की ज़रूरत है।
स्थानीय प्रशासन ने कहा है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे दस्तावेज़ों के साथ अपील कर सकते हैं और उन्हें हर संभव मदद दी जाएगी।
बताया जा रहा है कि अब तक राज्य में 63 लाख से अधिक नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं और करीब 49 लाख मामले अभी भी लंबित हैं।
मीर जाफ़र के वंशजों के लिए यह सिर्फ़ वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि उनकी पहचान और सम्मान का सवाल बन गया है। सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा भावुक होकर कहते हैं कि उनकी आख़िरी इच्छा बस इतनी है कि मरने के बाद उन्हें अपने पूर्वजों की तरह इसी मिट्टी में दफ़न होने का हक़ मिले।

