बदलते सामाजिक प्रतिमान

Nikhil Malhotra
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परिवार जिसे बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा जाता है जहाँ उसके अस्तित्व को एक पहचान मिलती है, जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है, संघर्षों से लड़ने की शिक्षा दी जाती…

परिवार जिसे बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा जाता है जहाँ उसके अस्तित्व को एक पहचान मिलती है, जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है, संघर्षों से लड़ने की शिक्षा दी जाती है और एक अच्छा इंसान बनाने का प्रयास किया जाता है, वही परिवार आज अपने बच्चों को आत्महत्या करने से रोकने में असमर्थ नजर आते हैं। संभवत: परिवारों ने अपनी भूमिका का उचित ढंग से निर्वाह करना छोड़ दिया है या फिर बच्चों को डिजिटल मीडिया के सहारे छोड़ दिया है।

आज के इस भौतिकतावादी समाज में परिवार, विवाह, नातेदारी, धर्म, विश्वास, समाज और यहाँ तक कि राज्य भी सब किसी न किसी प्रकार के जोखिम का सामना कर रहे हैं। ऐसे में एक आदर्श समाज या सभ्य समाज की स्थापना दूर की कौड़ी नजर आने लगा है

इसी माह अगस्त में उच्च शिक्षण संस्थानों के छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की कुछ बेहद दुखद और चिंताजनक खबरें सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश के महोबा के एक गांव में 19 वर्षीय आईटीआई छात्र अभय मिश्रा ने परीक्षा देकर लौटने के कुछ ही घंटों बाद फंदे से लटककर अपनी जान दे दी। उसके कुछ दोस्त पैसों के लेनदेन को लेकर उस पर अत्यधिक मानसिक दबाव बना रहे थे और उसे डरा-धमका रहे थे।

आईआईटी दिल्ली के कैंपस में 31 वर्षीय एमएससी फिजिक्स के छात्र ऋषिकेश कुमार ने लेक्चर हॉल परिसर की छठी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। कॉलेज प्रशासन पर लापरवाही और प्रशासनिक खामियों जैसे आरोप लग रहे हैं. आईआईटी खड़गपुर में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के 18 वर्षीय छात्र की कैंपस की इमारत की तीसरी मंजिल से गिरने (संदिग्ध आत्महत्या) के कारण मौत हो गई। जिसे मानसिक तनाव और व्यवहार में बदलाव का परिणाम माना जा रहा है।

ग्लोबल आईआईटी एलुमिनाई सपोर्ट ग्रुप द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच केवल आईआईटी संस्थानों में ही कम से कम 65 छात्रों ने अपनी जान दी। इन 65 में से 30 मौतें केवल 2024 और 2025 में दर्ज की गर्इं। पिछले 20 सालों (2004 से 2025) में आईआईटी संस्थानों के अंदर ही 160 से अधिक छात्रों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 69 मामले पिछले 5-6 सालों के हैं।

जुलाई 2023 में शिक्षा मंत्रालय ने संसद में 2018 से जुलाई 2023 के आंकड़े पेश किए थे जिनमे आईआईटी के 39, एनआईटी के 25 और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के 25 एवं आईआईएम, आईआईएसइआर के 9 छात्रों ने आत्महत्या की

विशेषज्ञ इन आत्महत्याओं के लिए ब्लैकमेलिंग, पढ़ाई-परीक्षा और करियर के लिए मानसिक और शैक्षणिक दबाव को, संस्थानों में उचित काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी या फिर अकेलेपन को जिम्मेदार मानते हैं।

लेकिन सवाल यह उठता है कि ये आंकड़े उन बच्चों के हैं जो इस देश के उच्च रैंकिंग वाले शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे थे जहाँ पहुचने के लिए इन्होने अपने जीवन के कितने महत्वपूर्ण वर्षों को लगा दिया, अपना बचपन भी ढंग से एन्जॉय नहीं किया होगा, अपनी मन चाहे लक्ष्य को पाने के बाद कोई तनाव या मानसिक दबाब में कैसे और क्यों आया? और अगर तनाव हुआ भी तो इतना कि उन्होंने खुद को उस स्थिति से बाहर निकालने या उस चुनौती का सामना करने से बेहतर आत्महत्या करना चुना।

इन घटनाओं के लिए शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ परिवार, समाज और प्रशासन भी बराबर का हिस्सेदार है। परिवार ने संघर्ष करना नहीं सिखाया, चुनौतियों का सामना करना नहीं सिखाया सब कुछ तैयार करके उनके हाथ में दे दिया। बच्चे पर केवल अच्छा कैरियर बनाने का दबाब डाला जाता है क्योंकि बच्चे का कैरियर परिवार की प्रतिष्ठा और सम्मान को निर्धारित करता है. शिक्षण संस्थान प्रतियोगिता पर बल देते हैं बच्चे की रूचि या योग्यता पर नहीं.

उसकों एक अंधी दौड़ में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते हैं न कि उसके व्यक्तित्व व चरित्र का निर्माण करने के लिए. प्रशासन इन घटनाओं के घटित होने के बाद उनकी जाँच करवा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड लेता है। इन आंकड़ों को देखकर समस्या की अनदेखी का पता चलता है

दूसरी तरफ वर्तमान युवा और किशोर पीढ़ी जो तेजी से विकसित होती टेक्नोलॉजी में इतनी खो गयी है कि उसे जीवित इंसान या भावनात्मक रिश्ते दिखाई नहीं देते। टेक्नोलॉजी ने इस पीढ़ी को मशीन/रोबोट में बदल दिया है, जिसके पास भावनाए नहीं हैं जो अत्यंत व्यक्तिवादी होता जा रहा है। समाजशास्त्री जिÞमरमैन ने परिवार में होने वाले परिवर्तनों के चक्र को तीन चरणों में प्रस्तुत किया है- ट्रस्टी परिवार, घरेलू परिवार और परमाणु परिवार।

उनके अनुसार ट्रस्टी परिवार उस स्थिति को व्यक्त करता है जहाँ परिवार राज्य-जैसे कार्य करता है जो परिवार के सदस्यों को नियंत्रित करने और उनकी देखरेख करने के लिए अपनी शक्ति का प्रयोग करता है। दूसरा, घरेलू परिवार राज्य और समाज के बीच संतुलन स्थापित करता है। और तीसरा, परमाणु परिवार जिसमे नियंत्रण की कमी और राज्य की मजबूत स्थिति और समाज में व्यक्तिगत विचारों का प्रसार होता है।

जहाँ पति, पत्नी और बच्चे शामिल तो होते हैं लेकिन उनके बीच के संबंध परिवार का अर्थ स्पष्ट नहीं करते हैं, जैसा कि पहले होता था। इस नयी मीडिया संस्कृति ने युवा पीढ़ी में ऐसा भ्रम पैदा किया है कि वे इंटरनेट को अपनी तमाम समस्याओं का समाधान कर्ता मानने लगे हैं, इसलिए अब उन्हें परिवार या अन्य रिश्तों की आवश्यकता नहीं।

अत: आवश्यक है कि समय रहते शिक्षक, बुद्धिजीवी वर्ग, राज्य और विषय विशेषज्ञ अपनी सक्रिय सहभागिता द्वारा इस समाज को एक बार पुन: बर्बर समाज की तरफ जाने से रोक लें, जहाँ मनुष्य और पशु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। अन्यथा सभ्य समाज एक इतिहास बनकर रह जायेगा और भावी पीढ़ी इसे केवल किताबों के पन्नों में देखेगी

लेखक- डॉ. ज्योति सिडाना

स्रोत: www.thehindipioneer.com

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