सचिन तेंदुलकर के जन्मदिन के मौके पर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या वह आज के तेज़ और बदलते क्रिकेट के दौर में भी उतने ही सफल होते। एक दिलचस्प घटना 2011 विश्व कप के समय की है, जब एक छोटे बच्चे ने पूछा था कि सचिन ने इंडियन प्रीमियर लीग में कितने शतक लगाए हैं। जब उसे पता चला कि केवल एक, तो वह हैरान रह गया। यह दिखाता है कि नई पीढ़ी सचिन को अलग नजरिए से देखती है, क्योंकि उन्होंने उन्हें मुख्य रूप से छोटे प्रारूप के क्रिकेट के संदर्भ में समझा है।
आज के युवा विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ियों को देखकर बड़े हुए हैं, जहां हर गेंद पर आक्रामक शॉट खेलना आम बात है। इसके मुकाबले सचिन का दौर तकनीक, धैर्य और लंबी पारियों पर आधारित था। हालांकि सचिन ने भी इंडियन प्रीमियर लीग में खेला, लेकिन उस समय वे अपने करियर के अंतिम चरण में थे। फिर भी उन्होंने 2010 में शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे मूल्यवान खिलाड़ी का पुरस्कार जीता।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सचिन की सबसे बड़ी ताकत उनकी परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता थी। उन्होंने अपने करियर में कई बार अपने खेल को बदला और नई चुनौतियों के अनुसार खुद को बेहतर बनाया। एबी डी विलियर्स और कायरन पोलार्ड जैसे खिलाड़ी भले ही अपनी ताकतवर बल्लेबाज़ी के लिए जाने जाते हों, लेकिन सचिन की टाइमिंग और तकनीक उन्हें हर दौर में खास बनाती है।
पूर्व खिलाड़ी आशीष नेहरा के अनुसार, बाद के वर्षों में क्रिकेट के नियम बल्लेबाज़ों के पक्ष में अधिक हो गए, जिससे रन बनाना अपेक्षाकृत आसान हुआ। यदि ऐसे नियम सचिन के समय में होते, तो संभव है कि उनके आंकड़े और भी अधिक प्रभावशाली होते। सचिन की बल्लेबाज़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे गेंद को आखिरी क्षण तक देखते थे और परिस्थितियों के अनुसार सही शॉट का चयन करते थे।
अंत में यही कहा जा सकता है कि हर दौर के अपने महान खिलाड़ी होते हैं, लेकिन सचिन तेंदुलकर की प्रतिभा और समर्पण ऐसे थे कि वे किसी भी युग में खुद को साबित कर सकते थे और सफल बल्लेबाज़ बने रहते।

