कभी घर और खेत की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली कानपुर देहात के अकबरपुर ब्लॉक की 32 वर्षीय श्वेता आज अपने गांव में पशुपालकों की भरोसेमंद साथी बन चुकी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के आजीविका मिशन से जुड़कर पशु सखी बनीं श्वेता ने पिछले करीब एक वर्ष में 120 परिवारों की 300 से अधिक बकरियों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई हैं। हालिया कृमिनाशन अभियान के दौरान उन्होंने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाने का काम किया।
पशु सखी के रूप में काम करते हुए श्वेता ने न सिर्फ ग्रामीण पशुपालकों की मदद की, बल्कि अपनी पहचान और आत्मविश्वास भी मजबूत किया। इस काम से उन्हें करीब 30 हजार रुपये की सालाना आय भी हुई, जिससे वह परिवार की आर्थिक जरूरतों और बच्चों की पढ़ाई में योगदान दे पा रही हैं।
तीन दिन के प्रशिक्षण ने बदली जिंदगी की दिशा
श्वेता अपने पति, दो बच्चों और सास-ससुर के साथ रहती हैं। पति तहसील में कार्यरत हैं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच श्वेता भी आर्थिक रूप से परिवार का सहयोग करना चाहती थीं। इसी दौरान उन्हें ग्राम पंचायत की समूह सखी के माध्यम से आजीविका मिशन के पशु सखी कार्यक्रम की जानकारी मिली।
कार्यक्रम के तहत चयन होने के बाद श्वेता को तीन दिन का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने पशु सखी के रूप में काम शुरू किया और गांव-गांव जाकर बकरी पालने वाले परिवारों से जुड़ने लगीं।
दवा के साथ पशुपालकों को देती हैं जरूरी जानकारी
श्वेता का काम केवल पशुओं तक दवा पहुंचाने तक सीमित नहीं है। वह पशुपालकों को बकरियों में होने वाली सामान्य बीमारियों, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवा और पशुओं की बेहतर देखभाल के बारे में भी जानकारी देती हैं।
लगातार पशुपालकों के संपर्क में रहने से उनकी सेवाओं का दायरा बढ़ता गया। करीब एक वर्ष में वह 120 परिवारों तक पहुंच चुकी हैं और 300 से अधिक बकरियों को उनकी सेवाओं का लाभ मिला है। हालिया कृमिनाशन अभियान में उन्होंने करीब 350 से 360 बकरियों तक दवा पहुंचाई।
इस पहल से पशुपालकों में पशुओं की नियमित देखभाल और समय पर उपचार को लेकर जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिली है।
गांव में बढ़ा सम्मान, अब सलाह लेने आते हैं पशुपालक
पशु सखी बनने के बाद श्वेता के जीवन में आर्थिक बदलाव के साथ सामाजिक बदलाव भी आया। पहले गांव में उनकी पहचान मुख्य रूप से परिवार की बहू के तौर पर थी, लेकिन अब पशुपालक बकरियों की बीमारी या देखभाल से जुड़ी समस्या होने पर उनसे सलाह लेते हैं।
श्वेता बताती हैं कि लोगों का भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह कहती हैं, “अब लोग हमारी बात समझते हैं और सम्मान के साथ बुलाते हैं।”
करीब 30 हजार रुपये की आय से परिवार को मिला सहारा
पशु सखी के रूप में काम करते हुए श्वेता ने करीब एक वर्ष में लगभग 30 हजार रुपये की आय अर्जित की। इस कमाई से वह बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतों में सहयोग कर रही हैं।
श्वेता के लिए यह आमदनी सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का जरिया भी बनी है। अब वह परिवार के आर्थिक फैसलों में अपनी भागीदारी को लेकर पहले से अधिक आत्मविश्वास महसूस करती हैं।
शुरुआत की चुनौतियों के बावजूद नहीं छोड़ा काम
पशु सखी के रूप में काम शुरू करना श्वेता के लिए आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में कई गांवों तक पैदल पहुंचकर पशुपालकों से संपर्क करना पड़ता था। नए काम को लेकर शुरुआती झिझक भी थी।
लेकिन उन्होंने चुनौतियों के बावजूद काम जारी रखा। धीरे-धीरे पशुपालकों का भरोसा बढ़ा और उनकी सेवाओं का असर दिखाई देने लगा। इसके साथ ही गांव में उनके काम को सम्मान मिलने लगा।
बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना
अब श्वेता अपने काम को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। उनका लक्ष्य अपनी आय बढ़ाने के साथ बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य देना है। वह चाहती हैं कि गांव में उनकी पहचान पशुपालकों की मदद करने वाली एक भरोसेमंद पशु सखी के रूप में बनी रहे।
आजीविका मिशन से मिले प्रशिक्षण और अवसर ने श्वेता के लिए घर की जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर आत्मनिर्भरता की राह खोली है। उनकी कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए यह संदेश देती है कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर वे परिवार की आर्थिक मजबूती के साथ-साथ अपने गांव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।


