हिंद महासागर में स्थित अहम सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया को लेकर नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने इस दिशा में दो मिसाइलें दागीं, हालांकि दोनों लक्ष्य तक पहुंचने में असफल रहीं।
फिर भी इस घटना ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं—खासतौर पर भारत के लिए।
तनाव कैसे बढ़ा?
घटना से एक दिन पहले ब्रिटेन ने संकेत दिया था कि डिएगो गार्सिया बेस का इस्तेमाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में ईरानी गतिविधियों को रोकने के लिए किया जा सकता है। इसके बाद ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘उकसाने वाली कार्रवाई’ बताया था।
मिसाइल लॉन्च की खबर सबसे पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दी, हालांकि ब्रिटेन ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसके बावजूद उसने ईरान के कदम को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताया है।
ईरान की सैन्य क्षमता पर सवाल
डिएगो गार्सिया ईरान से करीब 3,800 मील दूर है। आम तौर पर ईरान की मिसाइल रेंज 2,000 किमी तक मानी जाती है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि उसकी खोर्रमशहर मिसाइल 3,000 किमी तक मार कर सकती है।
यह दावा सही हुआ तो क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदल सकते हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सिर्फ एक असफल हमला नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका
- समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर असर
- भारत की मैरीटाइम सिक्योरिटी पर दबाव
- अमेरिका पर रणनीतिक निर्भरता बढ़ने का खतरा
डिएगो गार्सिया इस क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक अहम सैन्य केंद्र है, जो भारत की रणनीतिक सोच से भी जुड़ा हुआ है।
सैन्य संतुलन और भारत की सीमाएं
यह अड्डा भारत से लगभग 4,000 किमी दूर है, जो भारतीय वायुसेना की सामान्य ऑपरेशनल रेंज से बाहर है। वहीं, भारत की लंबी दूरी की मिसाइलें मुख्य रूप से परमाणु निवारण के लिए हैं, न कि पारंपरिक हमलों के लिए।
इसके उलट, अमेरिका की उन्नत सैन्य मौजूदगी इस बेस को बेहद सुरक्षित बनाती है।
क्या बढ़ेगा युद्ध का दायरा?
इस घटना के बाद ब्रिटेन और यूरोपीय देशों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- अब पश्चिमी देशों की हिचक कम हो सकती है
- अमेरिका के साथ सैन्य तालमेल बढ़ सकता है
- संघर्ष का दायरा मध्य-पूर्व से बाहर फैल सकता है
