कहते हैं, मुसीबत में जो साथ खड़ा हो, वही सच्चा अपना होता है। सामान्य दिनों में पड़ोसी होना एक भौगोलिक संयोग हो सकता है, लेकिन आपदा के समय पड़ोसी के साथ खड़ा हो…
कहते हैं, मुसीबत में जो साथ खड़ा हो, वही सच्चा अपना होता है। सामान्य दिनों में पड़ोसी होना एक भौगोलिक संयोग हो सकता है, लेकिन आपदा के समय पड़ोसी के साथ खड़ा होना रिश्ते की गहराई और विश्वसनीयता का प्रमाण होता है। नेपाल जब प्राकृतिक आपदा की मार से कराह रहा है, तब भारत एक बार फिर उसके साथ पूरी मजबूती से खड़ा दिखाई दे रहा है।
यह केवल राहत सामग्री भेजने या संवेदना व्यक्त करने की औपचारिकता नहीं, बल्कि उस रिश्ते का जीवंत प्रमाण है जिसे भारत और नेपाल ने सदियों से सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय स्तर पर सींचा है
नेपाल और भारत का रिश्ता किसी राजनयिक दस्तावेज की स्याही से नहीं बना। इसकी जड़ें हिमालय की चोटियों, जनकपुर की आस्था, काशी की संस्कृति, पशुपतिनाथ के विश्वास और लाखों परिवारों के आपसी संबंधों में हैं। यही कारण है कि नेपाल में आई आपदा की खबर भारत के लिए किसी दूर देश की खबर नहीं होती। वहां का दर्द यहां भी महसूस होता है
सवाल यह है कि संकट के इस दौर में भारत की भूमिका केवल राहत पहुंचाने तक सीमित रहेगी या यह त्रासदी दोनों देशों को भविष्य के लिए एक नई आपदा-साझेदारी की ओर भी ले जाएगी
जब पड़ोसी मुसीबत में हो तो कूटनीति से पहले इंसानियत बोलती है
भारत की विदेश नीति में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ अर्थात पड़ोसी पहले का सिद्धांत कोई खोखला नारा नहीं है। नेपाल के साथ उसका व्यवहार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। प्राकृतिक आपदा के समय भारत ने बार-बार यह प्रदर्शित किया है कि जरूरत के समय उसकी प्राथमिकता राजनीतिक लाभ नहीं, बल्कि मानवीय सहायता होती है
हालिया आपदा में भी भारत की ओर से राहत एवं बचाव सहायता पहुंचाने की पहल हुई। भारतीय एजेंसियों ने राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता और विशेषज्ञ सहयोग उपलब्ध कराया। प्रधानमंत्री स्तर पर नेपाल के नेतृत्व से संपर्क कर हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया गया
यहां भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। संकट के समय किसी पड़ोसी को यह महसूस कराना कि वह अकेला नहीं है—अपने आप में बड़ी कूटनीतिक पूंजी है
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में पड़ोसी देश एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं, भारत और नेपाल का संबंध यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक दूसरी भाषा भी हो सकती है—सहयोग, संवेदना और साझी जिम्मेदारी की भाषा
2015 ने जो भरोसा बनाया, वह आज भी कायम है
नेपाल के साथ भारत की आपदा-साझेदारी की चर्चा वर्ष 2015 के विनाशकारी भूकंप के बिना अधूरी रहेगी। उस समय भारत ने ‘ऑपरेशन मैत्री’ के माध्यम से बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान चलाया। भारतीय सेना, वायुसेना और एनडीआरएफ के दल नेपाल पहुंचे। लोगों को मलबे से निकाला गया, चिकित्सा सहायता दी गई और राहत सामग्री पहुंचाई गई
लेकिन असली परीक्षा उसके बाद हुई
आपदा के कैमरे जब लौट गए, अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां जब बदल गईं और दुनिया का ध्यान दूसरी घटनाओं की ओर चला गया, तब भी भारत नेपाल के पुनर्निर्माण में उसके साथ बना रहा। घरों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और सांस्कृतिक धरोहरों के पुनर्निर्माण में भारत की सहायता ने यह संदेश दिया कि भारत की मैत्री आपदा की खबर के साथ समाप्त नहीं होती
यही अंतर किसी भी सहायता अभियान को महज ‘राहत’ से ‘विश्वास’ में बदल देता है
रोटी-बेटी के रिश्ते की असली परीक्षा
भारत-नेपाल संबंधों को अक्सर ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा जाता है। यह उपमा भावनात्मक रूप से प्रभावी है, लेकिन आज इस रिश्ते को उससे आगे देखने की आवश्यकता है
यह संबंध अब रोटी-बेटी से बढ़कर रोजगार, व्यापार, शिक्षा, ऊर्जा, पर्यटन, संस्कृति और सुरक्षा की साझेदारी बन चुका है
दोनों देशों के नागरिक बिना उस कठोर सीमा व्यवस्था के एक-दूसरे के यहां आते-जाते हैं जो दुनिया के अधिकांश देशों में सामान्य है। हजारों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और बड़ी संख्या में भारतीय नेपाल में व्यापार तथा पर्यटन से जुड़े हैं। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं और समाज अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हैं
ऐसे में नेपाल की प्राकृतिक आपदा भारत के लिए केवल मानवीय प्रश्न नहीं है। इसके आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी प्रभाव भी भारत तक पहुंच सकते हैं
हिमालय में होने वाली हलचल का असर मैदानों तक पहुंचता है
यही भूगोल भारत और नेपाल को सहयोग के लिए मजबूर नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से प्रेरित करता है
आपदा अब अपवाद नहीं, नई चुनौती है
यहां हमें एक कठिन सवाल से आंख नहीं चुरानी चाहिए। क्या भारत और नेपाल हर बार आपदा आने के बाद राहत अभियान शुरू करते रहेंगे
या फिर दोनों देश ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जो आपदा आने से पहले खतरे की सूचना दे सके
जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का खतरा, अचानक आने वाली बाढ़, बादल फटना, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा अब असामान्य घटनाएं नहीं रह गई हैं
नेपाल और भारत दोनों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि इक्कीसवीं सदी की आपदा-प्रबंधन नीति केवल राहत दलों और हेलीकॉप्टरों पर निर्भर नहीं रह सकती
दोनों देशों को साझा पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करना होगा। नदी जलस्तर की वास्तविक समय में जानकारी साझा करनी होगी। हिमालयी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की संयुक्त निगरानी करनी होगी। सीमा से लगे क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच सीधा संपर्क तंत्र बनाना होगा
यदि नेपाल में किसी नदी का जलस्तर अचानक खतरनाक सीमा तक पहुंचता है तो उसकी सूचना भारतीय सीमावर्ती जिलों तक मिनटों में पहुंचे—यह व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है
राहत के साथ सम्मान भी जरूरी
भारत की सहायता की सबसे बड़ी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह नेपाल की संप्रभुता और आत्मसम्मान को पूरी तरह सम्मान देते हुए हो
नेपाल को मदद चाहिए, लेकिन उसे किसी ‘छोटे भाई’ की तरह नहीं, बराबरी के साझेदार की तरह मदद चाहिए। भारत-नेपाल संबंधों की मजबूती इसी बात में है कि भारत सहायता देते समय नेतृत्व थोपने के बजाय साझेदारी का भाव रखे
बड़े भाई की तरह नहीं, बड़े मित्र की तरह
यही भाव दोनों देशों के रिश्तों को दीर्घकालीन मजबूती देगा
चीन के संदर्भ से भी महत्वपूर्ण है नेपाल
भारत-नेपाल संबंधों को केवल भावनात्मक चश्मे से देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय का यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण पड़ोसी बनाती है
चीन नेपाल में अपनी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है। ऐसे वातावरण में भारत के लिए नेपाल के साथ भरोसेमंद और संवेदनशील संबंध बनाए रखना केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रणनीतिक आवश्यकता भी है
लेकिन इसका रास्ता प्रतिस्पर्धा की राजनीति से नहीं, विश्वास की राजनीति से होकर जाता है
नेपाल को यह भरोसा होना चाहिए कि भारत उसके विकास और सुरक्षा हितों का सम्मान करता है। दूसरी ओर भारत को भी यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से होगी कि नेपाल की धरती का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए न हो
इस संतुलन का सबसे मजबूत आधार वही है जो आपदा के समय दिखाई देता है—विश्वास
अब ‘ऑपरेशन मैत्री’ से आगे की जरूरत
भारत को नेपाल के साथ एक स्थायी भारत-नेपाल हिमालयी आपदा सहयोग तंत्र विकसित करने पर विचार करना चाहिए
इसमें दोनों देशों की आपदा प्रबंधन एजेंसियां, सेना, वायुसेना, जल संसाधन विशेषज्ञ, मौसम वैज्ञानिक, भूगर्भ वैज्ञानिक और स्थानीय प्रशासन शामिल हो सकते हैं। संयुक्त अभ्यास हों। साझा प्रशिक्षण हो। सीमावर्ती क्षेत्रों में आपदा प्रतिक्रिया केंद्र विकसित किए जाएं। अत्याधुनिक ड्रोन और उपग्रह तकनीक का इस्तेमाल हो। नदी और मौसम संबंधी आंकड़े साझा किए जाएं
क्योंकि आने वाले वर्षों में सवाल यह नहीं होगा कि अगली आपदा आएगी या नहीं। सवाल यह होगा कि जब अगली आपदा आएगी, तब हम कितने तैयार होंगे
भारत का संदेश साफ है
नेपाल की वर्तमान त्रासदी के बीच भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि अच्छे पड़ोसी की पहचान केवल अच्छे दिनों में नहीं होती
राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। सरकारें बदल सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बदल सकती हैं। लेकिन यदि मानवीय विश्वास कायम रहे तो रिश्ते अपनी राह तलाश लेते हैं
भारत और नेपाल के बीच भी यही सबसे बड़ी पूंजी है
आज जब नेपाल संकट में है, भारत उसके साथ खड़ा है। कल यदि भारत को किसी प्राकृतिक संकट का सामना करना पड़े तो नेपाल भी उसी आत्मीयता के साथ उसके साथ खड़ा हो—यही वास्तविक पड़ोसी धर्म है
सीमा की रेखाएं नक्शे पर खिंची होती हैं, संवेदनाओं की कोई सीमा नहीं होती
नेपाल की आपदा ने एक बार फिर यही संदेश दिया है कि भारत-नेपाल संबंधों की सबसे मजबूत नींव किसी संधि, समझौते या राजनीतिक घोषणा में नहीं, बल्कि उस भरोसे में है जो संकट की घड़ी में एक-दूसरे का हाथ थामने से पैदा होता है
आपदा की इस घड़ी में भारत का नेपाल के साथ खड़ा होना केवल पड़ोसी धर्म नहीं है। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उस भारतीय परंपरा का आधुनिक रूप है, जिसमें संकटग्रस्त मानव को पहले इंसान समझा जाता है और बाद में किसी देश का नागरिक
और शायद यही वह समय है जब भारत-नेपाल संबंधों को एक नया सूत्र दिया जाए
“आपदा में साथ, विकास में साझेदारी और भविष्य में साझा तैयारी।”
यही हिमालय की स्थायी शांति और दोनों देशों की साझा समृद्धि का रास्ता भी है
लेखक परिचय: डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह
पोस्ट डॉक्टोरल फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली)
स्रोत: www.thehindipioneer.com


