चुनाव नजदीक आते ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार जनता से नए-नए वादे कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने सत्ता में आने पर बौद्ध तीर्थस्थलों के विकास की बात कही है। हालांकि, उनके इस वादे को लेकर उत्तर प्रदेश की जनता, खासकर दलित और वंचित समाज के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अतीत में समाजवादी पार्टी का बौद्ध स्थलों और दलित समाज के प्रति क्या रुख रहा है।
आलोचकों के मुताबिक, बौद्ध धर्मस्थलों और स्मारकों का विकास समाजवादी पार्टी की प्राथमिकताओं में कभी प्रमुखता से नहीं रहा। इसके उलट, उसके शासनकाल की कुछ घटनाओं को लेकर दलित और बौद्ध समाज की ओर से सवाल उठते रहे हैं।
2012 की लखनऊ घटना का किया जिक्र
अखिलेश यादव मार्च 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। बृजलाल ने अपने लेख में 17 अगस्त 2012 की लखनऊ की एक घटना का जिक्र करते हुए आरोप लगाया है कि अलविदा की नमाज के बाद एक भीड़ बुद्धा पार्क की ओर बढ़ी और वहां तोड़फोड़ की गई।
उनका दावा है कि इस दौरान भगवान बुद्ध की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया तथा बौद्ध प्रतीकों और आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ हुई। बृजलाल के मुताबिक, इस दौरान बौद्ध भिक्षु भंते अशोकानंद और उनके शिष्यों के साथ भी मारपीट की गई तथा उनकी गाड़ियों को क्षतिग्रस्त किया गया।
बृजलाल ने आरोप लगाया कि घटना के बाद भी आरोपियों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने इसे तत्कालीन सरकार की कथित तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ते हुए अखिलेश यादव की सरकार पर सवाल उठाए हैं।
रोहिंग्या मुद्दे से जोड़ा घटनाक्रम
अपने लेख में बृजलाल ने लखनऊ की घटना को उस समय म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्ध समुदाय के बीच हुए संघर्ष से भी जोड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि म्यांमार की घटनाओं के विरोध में भारत में भी प्रदर्शन और हिंसा की स्थिति बनी।
हालांकि, इन घटनाओं और उनके कारणों को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्याएं रही हैं। बृजलाल का दावा है कि लखनऊ में बौद्ध प्रतीकों पर हमला इसी व्यापक घटनाक्रम की प्रतिक्रिया के तौर पर हुआ था।


