मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में लगाए गए पोस्टरों को लेकर एक बार फिर 2013 की हिंसा राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में लगाए गए पोस्टरों पर लिखा है- ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे।’ पोस्टरों के सामने आने के बाद कई इलाकों में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
पोस्टर लगाए जाने को लेकर कुछ स्थानों पर विवाद की स्थिति बनने की भी जानकारी सामने आई है। कुछ जगहों पर पोस्टरों का विरोध करने पहुंचे सपा कार्यकर्ताओं और पोस्टर लगाने वालों के बीच कहासुनी और झड़प की बात कही जा रही है। स्थिति को देखते हुए स्थानीय पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। हालांकि, अलग-अलग स्थानों पर घटनाक्रम को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
2013 में हुई थी व्यापक हिंसा
मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में सितंबर 2013 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने पूरे प्रदेश को प्रभावित किया था। हिंसा में 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों या अन्य स्थानों पर शरण लेनी पड़ी थी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना की मदद भी ली गई थी।
उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। हिंसा से निपटने और कानून-व्यवस्था को लेकर तत्कालीन सरकार विपक्ष के निशाने पर रही थी। विपक्षी दलों ने सरकार पर हिंसा को समय रहते नियंत्रित करने में विफल रहने और राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाए थे। सपा इन आरोपों को खारिज करती रही है।
सैफई महोत्सव को लेकर भी हुआ था विवाद
दंगों के बाद राहत शिविरों, विस्थापित परिवारों और उनके पुनर्वास को लेकर भी तत्कालीन सरकार पर सवाल उठे थे। इसी दौरान सैफई महोत्सव को लेकर भी अखिलेश सरकार विपक्ष के निशाने पर आई थी। विपक्ष ने महोत्सव के आयोजन को दंगा पीड़ितों की स्थिति से जोड़ते हुए सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल उठाए थे।
बरसी पर फिर राजनीतिक बहस तेज
दंगों की बरसी पर अलग-अलग जिलों में लगे पोस्टरों ने पुराने मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक विमर्श में ला दिया है। पोस्टरों के जरिए 2013 की हिंसा की याद दिलाने के साथ तत्कालीन सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
वहीं, पोस्टरों को लेकर सामने आए विवादों ने प्रदेश के कई हिस्सों में राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। 13 साल बाद भी मुजफ्फरनगर दंगे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा बने हुए हैं।


