दिल्ली पुलिस ने 24 अप्रैल को गाज़ियाबाद के लोनी इलाके से सलीम वास्तिक को गिरफ़्तार किया। जांच में सामने आया कि सलीम वास्तिक असल में वही सलीम ख़ान है, जो 1995 में एक 13 वर्षीय छात्र के अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था और साल 2000 से फरार चल रहा था।
क्या है पूरा मामला
सलीम ख़ान दिल्ली के एक स्कूल में मार्शल आर्ट ट्रेनर था। उस पर 1995 में छात्र के अपहरण और हत्या का आरोप लगा, जिसके बाद 1997 में उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।
साल 2000 में अंतरिम ज़मानत मिलने के बाद वह फरार हो गया। 2011 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी सज़ा बरकरार रखी, लेकिन वह लगातार पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।
26 साल तक कैसे बचा रहा
फरारी के दौरान सलीम ने “सलीम वास्तिक” नाम से नई पहचान बना ली। उसने गाज़ियाबाद के लोनी में रहकर सामान्य जीवन जीना शुरू किया, दुकान खोली और धीरे-धीरे सोशल मीडिया व टीवी डिबेट्स में सक्रिय हो गया।
वह खुद को “एक्स-मुस्लिम” बताकर विवादित बयान देता रहा और इसी वजह से चर्चा में आया।
पुलिस ने कैसे पकड़ा
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मार्च 2026 में मामले की दोबारा जांच शुरू की।
- गांव में जांच के दौरान परिवार ने उसे मृत बताया
- स्थानीय सूचना से लोनी में “सलीम वास्तिक” पर शक हुआ
- पुलिस ने फिंगरप्रिंट, आधार कार्ड, पारिवारिक जानकारी और पुरानी तस्वीरों का मिलान किया
- सभी सबूत मेल खाने पर उसकी पहचान सलीम ख़ान के रूप में पुख्ता हुई
24 अप्रैल को पुलिस ने उसे घर से गिरफ्तार कर लिया। शुरुआत में उसने पहचान से इनकार किया, लेकिन सबूत दिखाने पर सच स्वीकार कर लिया।
गिरफ्तारी के वक्त हालत
गिरफ्तारी के समय वह शारीरिक रूप से कमजोर था और बीमार नजर आ रहा था। पुलिस के अनुसार, उसने गिरफ्तारी के दौरान कहा—“जो कर्म किए हैं, वो भुगतने पड़ेंगे।”
हाल के सालों में क्या कर रहा था
पिछले कुछ वर्षों में सलीम वास्तिक सोशल मीडिया और यूट्यूब पर सक्रिय था। वह धार्मिक मुद्दों पर विवादित टिप्पणियों के कारण चर्चा में रहा और कुछ संगठनों के करीब भी माना जाता था।
फरवरी 2026 में उस पर हमला भी हुआ था, जिसके बाद उसे सुरक्षा दी गई थी।
पीड़ित परिवार की प्रतिक्रिया
31 साल पहले जिस बच्चे की हत्या हुई थी, उसका परिवार आज भी इस घटना के दर्द से उबर नहीं पाया है।
पीड़ित के पिता ने कहा कि बेटे की याद आज भी उतनी ही ताज़ा है। सलीम की गिरफ्तारी से उन्हें एक तरफ राहत है, लेकिन साथ ही डर भी बना हुआ है। यह मामला दिखाता है कि एक दोषी व्यक्ति वर्षों तक पहचान बदलकर समाज में रह सकता है, लेकिन तकनीकी जांच और लगातार प्रयास से कानून अंततः उसे पकड़ ही लेता है।

