नोएडा में श्रमिक आंदोलन के बाद कार्रवाई पर विवाद, 300 से अधिक गिरफ्तारियों पर उठे सवाल

shikha verma
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नोएडा में 13 अप्रैल को वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए श्रमिक प्रदर्शन के हिंसक हो जाने के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस घटना के बाद पुलिस ने करीब 300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें श्रमिक, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ पत्रकार भी शामिल बताए जा रहे हैं।

प्रदर्शन के बाद कई गिरफ्तारियां की गईं, जबकि कुछ लोगों को बाद में भी हिरासत में लिया गया। पुलिस का दावा है कि यह आंदोलन सुनियोजित साजिश का हिस्सा हो सकता है और इसके पीछे संगठित नेटवर्क की भूमिका की जांच की जा रही है।

वहीं मानवाधिकार संगठनों और सिविल सोसायटी ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि गिरफ्तारियों के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और कई लोगों को बिना वारंट हिरासत में लिया गया। कुछ संगठनों ने यह भी दावा किया है कि हिरासत में रखे गए लोगों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आई हैं।

परिजनों का कहना है कि कई गिरफ्तार लोगों की स्थिति और उन पर लगे आरोपों की पूरी जानकारी उन्हें नहीं दी गई है। उनका आरोप है कि पुलिस ने शुरुआत में शांतिभंग की धारा के तहत कार्रवाई की, लेकिन बाद में गंभीर धाराएं जोड़ दी गईं, जिससे मामले की जटिलता बढ़ गई है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज जैसे मानवाधिकार संगठनों ने मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है और कहा है कि हिरासत में सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।

वहीं प्रशासन की ओर से कहा गया है कि प्रदर्शन से पहले कई सोशल मीडिया ग्रुप और अकाउंट सक्रिय हुए थे, जिनकी जांच की जा रही है। पुलिस अधिकारियों का दावा है कि कुछ तत्वों द्वारा माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई थी।

इसी बीच श्रमिकों की वेतन वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की घोषणा की है। हालांकि, जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके परिवार अभी भी न्याय और रिहाई की मांग कर रहे हैं।

यह मामला अब सिर्फ एक श्रमिक आंदोलन नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था, मानवाधिकार और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर बहस का विषय बन गया है।

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